Karwa Chauth 2019 यह है करवाचौथ व्रत का शुभ मुहूर्त समय व पूजा विधि द्रौपदी ने भी रखा था यह व्रत

2019-10-14T16:51:22Z

Karwa Chauth 2019 इस बार करवाचौथ पर प्रेम संबंध दाम्पत्य सुख प्रदाता शुक्र ग्रह की रहेगी विशेष कृपा क्योंकि युवा चंद्र का वृष राशिरोहिणी नक्षत्र में उदय होना एवं शुक्र ग्रह का अपनी तुला राशि में युवावस्था में विराजमान रहना

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को यह व्रत किया जाता है। यदि दो दिन चंद्रोदय व्यापिनी या दोनों ही दिन न हो तो पहले दिन वाली चंद्रोदय ही लेनी चाहिए। इस बार दिनांक 17 अक्टूबर 2019,बृहस्पतिवार को चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी तिथि प्रातः 6:48 बजे के बाद आरम्भ होगी।इस दिन कृतिका नक्षत्र अपराह्न 3:52 बजे तक रहेगा तदोपरांत रोहिणी नक्षत्र प्रारम्भ होगा जो कि पूर्ण रात्रि रहेगा।इस बार की विशेष बात चंद्रमा का वृष राशि एवं रोहिणी नक्षत्र में उदय होना एवं सौंदर्य प्रदाता,विलासिता पूर्ण ग्रह शुक्र का भी युवावस्था में अपनी तुला राशि में विराजमान होना,साथ ही तुला की 45 मुहूर्त्ती संक्रांति होना एवं करवाचौथ व्रत बृहस्पतिवार का होने से गुरु देव की भी विशेष कृपा रहेगी।
यह व्रत संतान देने वाला भी होता है

यह सब ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस चंद्रोदय में दाम्पत्य सुख एवं प्रेम को बढ़ाते हैं।ज्योतिष के अनुसार रोहिणी नक्षत्र का स्वामी स्वयं चंद्रमा होने के कारण एवं चंद्र स्वयं अपनी उच्च राशि वृष में उदय होने के कारण हर्षोल्लास देगा।करवाचौथ व्रत स्त्रियों का सर्वाधिक प्रिय व्रत है।यूं तो प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी एवं चंद्र का व्रत किया जाता है परंतु इसमें करवाचौथ व्रत का सर्वाधिक महत्व है।इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां अटल सुहाग,पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य एवं मंगल कामनाओं के लिए व्रत रखतीं हैं।यह व्रत सौभाग्य एवं शुभ संतान देने वाला होता है।भरतीय परम्परा के अनुसार करवाचौथ का त्योहार उस पवित्र बंधन का सूचक है जो पति-पत्नी के बीच होता है।हिन्दू संस्कृति में पति को परमेश्वर की उपमा दी गई है।

महाभारतकाल में द्रौपति ने पांडवो के लिए किया था ये व्रत

नव विवाहिताएं विवाह के पहले वर्ष से ही यह व्रत प्रारम्भ करतीं हैं।चौथ का व्रत चौथ से ही आरम्भ किया जाता है।इसके बाद ही अन्य व्रत करने की परंपरा है।कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चौथ को चंद्र देवता की पूजा के साथ-साथ शिव- पार्वती और स्वामी कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है।शिव-पार्वती पूजा का विधान इसलिए माना गया है कि जिस प्रकार शैल पुत्री पार्वती ने घोर तपस्या करके भगवान शंकर को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया है, वैसे ही उन्हें भी प्राप्त हो। वैसे भी गौरी का पूजन कुंवारी कन्याओं और विवाहित स्त्रियों के लिए विशेष महत्व माना जाता है।इस दिन कुंवारी कन्याएं गौरा देवी का पूजन करती हैं।महाभारत काल में पांडवों की रक्षा हेतु द्रौपदी ने यह व्रत किया था।
इस दिन व्रती स्त्रियों को प्रातः काल स्नानादि के बाद पति,  पुत्र, पौत्र तथा सुख सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर यह व्रत करना चाहिए।इस व्रत में शिव-पार्वती,कार्तिकेय,गणेश तथा चंद्रमा का पूजन करके अर्ध्य देकर ही जल,भोजन ग्रहण करना चाहिए। चंद्रोदय के कुछ पूर्व एक पतले पर कपड़ा बिछाकर उस मिट्टी से शिव जी, पार्वती जी, कार्तिकेय जी और चन्द्रमा की छोटी-छोटी मूर्तियां बनाकर अथवा करवाचौथ के छपे चित्र लगाकर पानी से भरा लोटा और करवा रखकर करवाचौथ की कहानी सुननी चाहिए। कहानी सुनने से पूर्व करवे पर रोली से एक सतिया बनाकर उस पर रोली से 13 बिंदियां लगाई जाती हैं। हाथ पर गेहूं के 13 दाने लेकर कथा सुनी जाती है और चांद निकल आने पर उसे अर्ध्य देकर स्त्रियां भोजन करती हैं।
चंद्र दर्शन के समय क्या करें
चंद्रमा निकलने से पूर्व पूजा स्थल रंगोली से सजाया जाता है तथा एक टोटीदार करवा में उरई की पांच या सात सीकें डालकर रखा जाता है, करवा मिट्टी का होता है।यदि पहली बार करवाचौथ चांदी या सोने के करवे से पूजा जाय तो हर बार उसी की पूजा होती है, फिर रात्रि में चंद्रमा निकलने पर चंद्र दर्शन कर अर्ध्य दिया जाता है।चन्द्रमा के चित्र पर निरंतर धार छोड़ी जाती है तथा सुहाग और समृद्वि की कामना की जाती है तथा पति व बजुर्गों के चरण स्पर्श कर बने हुए पकवान प्रसाद में चढ़ाए जाते हैं।व्रत पूर्ण होने पर उसका प्रसाद पाते हैं।गौरी माता सुहाग की देवी हैं, अतएव उनके द्वारा निर्दिष्ट यह व्रत भारतीय सुहागवती महिलाओं की श्रद्धा का केंद्र बिंदु है।जिस वर्ष लड़की की शादी होती है, उस वर्ष उसके घर से 14 चीनी के करवों,बर्तनों,कपड़ों आदि के साथ बायना भी दिया जाता है।
17 अक्टूबर को पड़ रहा करवाचौथ, जानें इस हफ्ते के व्रत-त्योहार
अन्य व्रतों के साथ इस करवाचौथ व्रत का उजमन किया जाता है, इसमें 13 सुहागिनों को भोजन कराने के बाद उनके माथे पर बिंदी लगाकर और सुहाग की वस्तुएं एवं दक्षिणा देकर विदा कर दिया जाता है।
- ज्योतिषाचार्य पंडित राजीव शर्मा
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Posted By: Vandana Sharma

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