kanpur : चेस्ट कैंसर को डिटेक्ट करने के लिए यूआईईटी कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेंट के टीचर ने आईडेटी फाइंग ब्लड वेसल्स इन लंग्स एक्सरे रेडियोग्र्राफ टेक्नोलॉजी डेवलप की है. जिसका यूएस पेटेंट भी एक साल पहले ग्र्रांट हो चुका है. इस टेक्नोलॉजी की हेल्प से चेस्ट पेशेंट का एक्सरे के माध्यम से ही कैंसर डिटेक्ट कर लिया जाएगा. सीएसजेएमयू का पहला फैकल्टी मेंबर बनने का गौरव डॉ. संदेश गुप्त ने हासिल कर लिया है. पेटेंट फाइल इयर 2007 में किया गया था. हालांकि एशियन कंट्रीज में कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी का यूज मेडिकल फील्ड में काफी कम किया जा रहा है. लेकिन धीरे धीरे अब एक्सपर्ट डॉक्टर्स इस टेक्नोलॉजी का यूज करने लगे है.


तीन महीने में डेवलप कियाछत्रपति शाहू जी महराज यूनीवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर अशोक कुमार ने बताया कि यूआईईटी के कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेंट के फैकल्टी मेंबर डॉ. संदेश गुप्त ने ऐसा साफ्टवेयर डेवलप किया है जिससे कि चेस्ट के डिजिटल एक्सरे से ही फेफड़े के कैंसर को डिटेक्ट कर लिया जाएगा. इस साफ्टवेयर को डेवलप कर लिया गया है. साफ्टवेयर को डेवलप करने में डॉ. गुप्त को तीन महीने का टाइम लगा था. हालांकि बंगलूर में रहकर ही इस सिस्टम को डेवलप किया था.पेटेट में 6 साल लग गए


मेडिकल इक्यूमेंट बनाने वाली कंपनी सिमेंस ने यह पेटेंट 4 जून 2005 को फाइल किया था. 11 सितंबर 2012 को इस यूएस पेटेंट को ग्र्रांट मिल गयी. यूनीवर्सिटी के लिए यह गौरव की बात है कि उनके  यहां ऐसी फैकल्टी है जिस पर सभी को गर्व है. पेटेंट को ग्र्रांट मिलने में करीब 6 साल का वक्त लग गया.

कैड टूल विकसित किया

यूआईईटी से बीटेक करने के बाद डॉ. संदेश गुप्त ने इयर यूपी टेक्निकल यूनीवर्सिटी से पीएचडी के लिए रजिस्ट््रेशन कराया था. रिसर्च का टॉपिक मेडिकल फील्ड की इमेज प्रोसेसिंग चूस किया था. जिसके लिए करीब 3 महीने की इंटर्नशिप के लिए सीमेंस कंपनी बंगलूर में जाना पड़ा. जहां पर चेस्ट एक्सरे के लिए कम्प्यूटर एडेड डाइग्नोसिस (कैड )टूल डेवलप करने की दिशा में वर्क शुरू कर दिया. काफी मेहनत करने के बाद सफलता मिल गयी. इस टूल का यूज एमआरआई, पैट स्पेक्ट के स्कैन में किया जा रहा है. इंटर्नशिप के लिए परमीशन तत्कालीन वाइस चांसलर प्रो. एसएस कटियार ने दी थी. रेडियोलॉजी में बेहतर यूजरेडियोलॉजिस्ट के पास वर्क लोड इतना ज्यादा हो गया कि जरा सा अगर चूक हो गयी तो फिर पेशेंट का बेड़ा गर्क हो जाएगा. अगर एक्सरे की इमेज देखने में चूक हो गयी तो रोगी की हालत खराब हो जाएगी. लेकिन अब डिजिटल एक्सरे की टेक्नोलॉजी आने से रेडियोलॉजिस्ट व एक्सपर्ट डाक्टर्स की मुश्किलें काफी आसान हो गयी हैैं. डिजिटल एक्सरे में कम्प्यूटर पहले रीड कर लेता है अगर कहीं कुछ प्रॉब्लम हुई तो वहां पर मार्क बना देता है. ऐसे में रेडियोलॉजिस्ट चेक कर लेगा कि जो मार्क है उसमें प्रॉब्लम है या नहीं . अगर है तो फिर सही पॉजिटिव और गलत होने पर फाल्स पॉजिटिव की रिपोर्ट मिल जाती है.कैंसर की गांठ को पकड़ लेगानामर्ल एक्सरे में रिब्स को भी कैंसर गांठ समझने की संभावना काफी ज्यादा होती है. इसे आईडेटीफाई करने के लिए कैड टूल का यूज किया जाता है.


एक्सरे में क्या दिखता है---------------रिब्स (पसलियां) होती हैरिब्स की शैडो भी होती हैलंग्स मास नजर आता हैब्लड बेसल दिखती हैगांठ(नोड्यूल) दिखती हैकैसे पहचानते है -कैड टूल से बाटम अप्रोच करते है.   -ब्लड बेसल भी गांठ का आभास कराती है.- एक्सरे से रिब्स की इमेज हटाते है- फिर रिब्स की शैडो हटाते है- ब्लड बेसल पहचान कर उन्हें हटाते है- इसके बाद अगर गांठ होती है तो दिख जाती है.सीएसजेएमयू के यूआईईटी के कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेंट के डॉ. संदेश गुप्त ने जो इनोवेशन किया है वो काबिले तारीफ है. यूनीवर्सिटी भी अब इनोवेशन को प्रमोट करने के लिए पेटेंट सेल खोलेगी ताकि रिसर्च वर्क को बढ़ावा दिया जा सके. जिनके रिसर्च सोसाइटी के लिए अहम होंगे उन फैकल्टी मेंबर्स को प्रमोशन में प्रायोरिटी दी जाएगी. इसके अलावा अगर वो कोई रिसर्च वर्क करना चाहेंगे तो यूनीवर्सिटी उन्हें फंड अवलेवल कराएगी.- प्रो. अशोक कुमार, वाइस चांसलर

Posted By: Abhishek Tripathi