पंजाबी हार्टलैंड का सीन. किसी के इंतजार में बारात रुकी हुई है. उसके बिना जाया भी नहीं जा सकता वही उन लम्हों को रिकार्ड करेगा जिसे देखकर घरवाले और दोस्ता बाद में खुश होंगे खिलखिलाएंगे. आखिरकार वीडियोग्राफर बिटटू की एंट्री होती है. माहौल में तनाव खत्म हो चुका है. बहरहाल एक्साइटमेंट ज्यादा देर तक बना नहीं रह पाता कम से कम दर्शकों के लिए.


सुपवित्र बाबुल की लिखी और डायरेक्ट की हुई यह मूवी उस इंसान के वीडियो जैसी है जो जिंदगी में कुछ बडा करना चाहता है. किस्मत की बात यह है कि उसकी अंतरात्मा जो वह चाहता है उसे हासिल करने के लिए एक सीमा से नीचे नहीं गिरने देती.Movie Review video हालांकि इन दोनों के बीच बैलेंस बनाना बेहद मुश्किल काम है. स्टोरीलाइन आनंदपुर से चलकर दिल्ली  होते हुए शिमला और वापस जहां से शुरू हुई थी वहीं पहुंच जाती है. इस सबके बीच उसका पेस एक जैसा रहता है. स्क्रीरनप्ले में ज्या दा जान नहीं है और डायलॉग भुलाने लायक हैं. म्यूजिक जरूर बढिया और इमोशंस से कनेक्ट करने वाला है.


बिटटू के रोल में नजर आने वाले पुलकित सम्राट इससे बेहतर डेब्यू की उम्मी्द नहीं कर सकते थे, आखिरी बार वह एक सास बहू वाले सोप में नजर आए थे. उनमें उम्मीद नजर आती है और साथी कलाकारों की तुलना में ओवरएक्टिंग से बचते नजर आए.बिटटू का दिल चुराने वाली अमिता पाठक अपनी छाप छोड पाने में नाकामयाब रहीं. वह मूवी के प्रोडयूसर कुमार मंगत की बेटी हैं.

एक और डेब्यू एक्टर अशोक पाठक का जिक्र किया जाना लाजिमी है जो बिटटू के दोस्त की भूमिका में नजर आए. अपने ह़यूमर से वह लोगों के चेहरे पर खिलखिलाहट लाने में कामयाब रहे.बिटटू बॉस कई मायनों में बैंड बाजा बारात की याद दिलाती है. हालांकि इसे कांप्लीमेंट के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए. एंटरटेनमेंट के मामले में मूवी बेहतर कर सकती थी. Powered by Mid Day

Posted By: Dhananjay Shukla