लेफ़्टिनेंट जनरल राहील शरीफ़ के पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष बनने और उसके बाद के घटनाक्रम पर भारत की नज़रें टिकी हुई हैं. दरअसल ऐसा होता रहा है कि भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों की प्रक्रिया पर पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष प्रभाव डालते रहे हैं.


1999 में परवेज़ मुशर्ऱफ पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ और राष्ट्रपति बने. 2002 के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ कश्मीर और अन्य मुद्दों को सुलझाने के लिए एक प्रक्रिया शुरु की, जिसने काफ़ी रफ़्तार भी पकड़ी.एक डील पर भारत और पाकिस्तान काफ़ी क़रीब भी आ गए थे. परवेज़ मुशर्रफ़ और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच तारिक़ अज़ीज़ और सतिन्दर लांबा ने गुपचुप समझौता कराया था. लेकिन वो डील हो नहीं सकी. कई वजहों से मसलन, यहाँ उत्तर प्रदेश में चुनाव और पाकिस्तान में परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ माहौल बन गया था.लेकिन उस समय काफ़ी ठोस क़दम उठाए गए थे और इसकी एक वजह पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिरता और वहाँ की सेना का केंद्रबिंदु का एक होना था. इस कारण जो वादे राजनीतिक स्तर पर किए जाते थे उन्हें सैन्य स्तर पर भी समर्थन मिलता था.


इसके बाद हमने देखा कि मंदी आई और बनी रही लेकिन कश्मीर के अंदर लगातार दस साल 2002 से 2012 तक हालात सुधरे, बॉर्डर पर तनाव कम हुआ. इसका यही कारण था कि पाकिस्तानी सेना भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए तत्पर थी.

कुछ लोगों का कहना है कि यह अमरीका के दबाब के कारण था तो कुछ लोगों का कहना है कि पाकिस्तान सेना के अंदर ही रियलाइज़ेशन आ गया था. वजह जो भी हो लेकिन पाकिस्तान के सेना प्रमुख जो फ़ैसले ले पाए वो शायद एक राजनेता न ले पाते.भारत पाकिस्तान में एक ऐसा सेना प्रमुख चाहेगा जो बहुत ज्यादा विचारधारा उन्मुख न हो यानी कि बहुत कट्टर व्यक्तिगत राजनीतिक सोच से ज्यादा तथ्यात्मक और व्यवहारिक हो. ऐसा होने पर वह दोनों मुल्कों के हित में रहेगा.पाकिस्तान का इतिहास रहा है कि जनरल ज़िया उल हक़ के बाद वहां के जनरल पाकिस्तान को जिहाद पसंद विचारधारा की तरफ़ ले गए जिससे भारत को बहुत नुक़सान हुआ.परवेज़ मुशर्रफ़ जैसे व्यवहारिक नेता भी रहे हैं जो संकटों को दूर कर व्यापार को बढ़ावा देना और रिश्ते बेहतर करना चाहते थे. अब नवाज़ शरीफ़ भी इसकी बातें कर रहे हैं, तो ये ज़रूरी है कि कोई ऐसा ही आर्मी चीफ़ आए जो अमन चाहता हो.पाकिस्तान में आर्मी चीफ़ की अहमियत कोई नई बात नहीं है. एक तरह से 1950 से ही, जब पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना और लियाक़त अली ख़ान गुज़र गए, उसके बाद से सेना की नीति निर्धारण में अहम भूमिका रही है.राहील शरीफ़ की मुश्किल

पाकिस्तान का कोर कमांडर कांफ्रेंस, जहाँ पाकिस्तान के अलग-अलग आर्मी के कोर कमांडर मिलते हैं, ही राजनीतिक मुद्दों पर ज़रूरी कदम उठाते हैं.कई लोगों का मानना है कि ये कोर कमांडर कांफ्रेंस वहाँ की कैबिनेट से ज्यादा महत्वपूर्ण है. यह हक़ीक़त है कि पाकिस्तान में आर्मी सबसे बड़ी और ताक़तवर संस्था है. विदेशी नीतियों और मुद्दों पर सेना का एक तरह से वीटो है.भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते वहाँ के सेना प्रमुख के हाथ में ही होते हैं. जनरल राहील शरीफ़ के लिए यह बहुत मुश्किल चुनाव होगा.एक तरफ़ तो वो पाकिस्तानी के अंदरूनी ख़तरे ख़त्म करना चाहेंगे लेकिन कोशिश करेंगे कि जिहादी समूहों के समर्थक सेना के ख़िलाफ़ न हों और उनको ख़ुश करने के लिए वो भारत के साथ दोस्ती का रिश्ता नहीं चाहेंगे.जबकि दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के आर्थिक हालात बहुत ख़राब हैं. पाकिस्तान इस मुश्किल हालात में भारत के साथ रिश्ते नहीं बिगाड़ना चाहेगा क्योंकि वो उसके हित में नहीं है.वो चाहेंगे कि ऐसी कोई परिस्थिति न पैदा हो जिससे भारत के साथ कोई जंग हो या कोई हालात बिगड़े. इसलिए जनरल राहील के लिए परिस्थितियों को संभालना चुनौती भरा होगा.
जनरल कियानी ने इस दिशा में जो क़दम उठाया था उसे देखते हुए क्या भारत उम्मीद करेगा कि जनरल राहील शरीफ़ एक अलग दिशा में जाएंगे.ये बहुत पहले से कहा जाता है कि उनके नवाज़ शरीफ़ के साथ पारिवारिक रिश्ते रहे हैं. उन्होंने जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ भी काम किया था. मुशर्रफ़ उनके गुरु की तरह रहे हैं तो हो सकता है कि वे भारत के साथ बेहतर रिश्तों के लिए सकारात्मक क़दम उठाएं.

Posted By: Subhesh Sharma