शुक्रवार को शेयर बाज़ार में आए उफ़ान और सोमवार को लगातार बनी रही बढ़त से अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि नतीजे आने से पहले ही बाज़ार ने जीतने वाली पार्टी के बारे में अपना आकलन कर लिया है.


शेयर बाज़ार के विश्लेषकों का मानना है कि बाज़ार को एक  स्थिर सरकार आने की उम्मीद है, जो मुश्किल फ़ैसले लेने से झिझकेगी नहीं और रुकी हुई विकास दर को आगे बढ़ाएगी.वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन कंपनी में शेयर बाज़ार विश्लेषक धीरेन्द्र कुमार ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि, “बाज़ार की पसंद नरेन्द्र मोदी हैं, जिन्होंने अपने हर भाषण में साफ़ किया है कि वो मुश्किल फ़ैसले लेने को तैयार हैं, और इस व़क्त बाज़ार को आर्थिक नीति में कोई आधारभूत परिवर्तन नहीं बल्कि सुलझी हुई सोच और कड़ा रुख ही चाहिए.”हालांकि धीरेन्द्र कुमार ध्यान दिलाते हैं कि आम चुनाव के नतीजों पर बाज़ार का  पहला आकलन ग़लत भी हो सकता है और पिछले दो आम चुनावों में दोनों बार ही बाज़ार ग़लत साबित हुआ था.


साल 2004 में बाज़ार का पहला अंदाज़ा एनडीए सरकार के सरकार बनाने का था, पर इसके उलट कांग्रेस ने वाम दलों के समर्थन से सरकार बनाई और वामपंथी नीतियों से डरकर बाज़ार एक दिन में 14 प्रतिशत गिरा था.धीरेन्द्र कुमार कहते हैं, “बाज़ार की शुरुआती नाउम्मीदी के बिल्कुल विपरीत 2004 के यूपीए के कार्यकाल में बाज़ार का ‘बुल रन’ हुआ और सेंसेक्स 3,000 से 20,000 तक पहुंचा.”

2009 के आम चुनाव में जब यूपीए सरकार भारी बहुमत के साथ लौटी, तो बाज़ार बहुत आशावान हुआ और 12-14 प्रतिशत का उछाल आया, लेकिन उसके बाद पांच साल का दौर कुछ और ही रहा.ग्रामीण अर्थव्यवस्थाएसएमसी ग्लोबल सिक्यूरिटीज़ में शेयर बाज़ार विश्लेषक जगन्नाथ थुनुगुतलम भी मानते हैं कि बाज़ार में आई तेज़ी के पीछे एक स्थिर सरकार और मज़बूत फ़ैसले लेने की उम्मीद ही है.बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “भारत में व्यापार से जुड़े कई फ़ैसले सरकारी नियम और मंज़ूरी के मोहताज होते हैं, ऐसे में बाज़ार का सरकार बनने और उसके आर्थिक रुख़ का विश्लेषण करने में दिलचस्पी रखना लाज़मी है, और इस व़क्त बाज़ार भारी बहुमत से स्थिर सरकार बनने की उम्मीद लगा रहा है.”"बाज़ार की समझ ज़्यादातर शहरों, मीडिया, एग्ज़िट पोल और ऐसे मानकों से बनती है जो छोटे सैम्पल पर आधारित होते हैं और ये अधूरी हो सकती है."-जगन्नाथ थुनुगुतलम, शेयर बाज़ार विश्लेषकएक ओर धीरेन्द्र कुमार जहां नई सरकार के बाज़ार की उम्मीदों पर खरा उतरने पर सवाल उठाते हैं, वहीं दूसरी ओर जगन्नाथ थुनुगुतलम तो नई सरकार बनानेवाली पार्टी के बाज़ार के आकलन पर ही आश्वस्त नहीं हैं.

जगन्नाथ थुनुगुतलम के मुताबिक इस आकलन में कई बार गलती हुई है, “भारत में एक बड़ा फ़ैक्टर है ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जिसे समझना बहुत मुश्किल है, बाज़ार की समझ ज़्यादातर शहरों, मीडिया, एग्ज़िट पोल और ऐसे मानकों से बनती है जो छोटे सैम्पल पर आधारित होते हैं और ये अधूरी हो सकती है.”वो कहते हैं कि ग्रामीण वोटर की समझ इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका दिन प्रति दिन महत्वपूर्ण होती जा रही है.धीरेन्द्र कुमार के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में बाज़ार में आई तेज़ी असल नतीजे सामने आने पर बदलेगी, और नतीजे बाज़ार के मन-माफ़िक भी हुए तो इसमें कुछ गिरावट आने की बड़ी संभावना है.

Posted By: Subhesh Sharma