इनसे पहले कोर्इ महिला गवर्नर नहीं बनी थी कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष भी थीं सरोजिनी नायडू

2019-02-13T10:18:30Z

भारत की महिला गवर्नर आैर कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष रही सरोजिनी नायडू की आज जयंती है। आइए जानें इस खास दिन पर सरोजिनी नायडू से जुड़ी खास बातें

कानपुर। सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी,1879 को हैदराबाद में हुआ था। एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्मीं सरोजिनी अघोरनाथ चट्टोपाध्याय की सबसे बड़ी बेटी थीं। इनके पिता निजाम कॉलेज, हैदराबाद के प्रिंसिपल थे। एक आधिकारिक वेबसाइट ब्रिटानिका डाॅट काॅम के मुताबिक सरोजिनी नायडू बचपन से ही काफी तेज व चंचल स्वभाव थी।  
सरोजिनी ने 12 साल की उम्र में मद्रास विश्वविद्यालय में एडमीशन
बचपन से कुछ अलग करने की चाहत रखने वाली सरोजिनी ने 12 साल की उम्र में मद्रास विश्वविद्यालय में एडमीशन ले लिया था। 1895 से 1898 के बीच किंग्स कॉलेज, लंदन में और बाद में गिर्टन कॉलेज, कैम्ब्रिज में स्टडी किया। सरोजिनी नायडू ने बढ़ते वक्त के साथ खुद को राजनीतिक कार्यकर्ता, नारीवादी, व एक बेहतरीन कवि के रूप में भी पेश किया।
सरोजिनी राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला प्रेसीडेंट बनी थीं
भारत में बड़े स्तर पर बदलाव करने वाली सरोजिनी इंग्लैंड में मताधिकार अभियान में कुछ अनुभव के बाद भारत के कांग्रेस आंदोलन और महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के लिए अागे आर्इ। 1924 में उन्होंने पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के हित में यात्रा की। अगले साल वह राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला प्रेसीडेंट बन गर्इ थीं।

1947 में सराेजिनी नायडू में भारत में पहली महिला राज्यपाल बनी थीं

सरोजनी से पहले कांग्रेस की महिला अध्यक्ष एनी बेसेंट थीं। सरोजिनी नायडू ने 1928 में कांग्रेस मूवमेंट पर व्याख्यान देते हुए उत्तरी अमेरिका का दौरा किया था। भारत लाैटने के बाद सरोजिनी नायडू ने भारत ब्रिटिश-विरोधी गतिविधि में 1930, 1932 और 1942 में जेल यात्रा की थीं। इसके बाद सरोजिनी 1947 में यूपी में देश की पहली महिला गवर्नर बनी थीं।

सरोजिनी ने राज्यपाल पद पर रहते हुए इस दुनिया को अलविदा कहा था

द नाइटेंगल आॅफ इंडिया कही जाने वाली सरोजिनी नायडू ने 2 मार्च, 1949 को राज्यपाल पद पर रहते हुए इस दुनिया को अलविदा कहा था। सरोजनी की सभी कविताएं अंग्रेजी में थी। उनकी पहली कविता द गोल्डन थ्रेशोल्ड (1905) थी। इसके बाद द बर्ड ऑफ टाइम (1912) आर्इ आैर यह 1914 में रॉयल सोसाइटी ऑफ लिटरेचर की फेलो चुनी गर्इं थी।

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