गोरखपुर की सरजमी बेजोड़ रत्नों और खजानों से भरपूर हुआ करती थी. प्रेमचन्द फिराक और कबीर की धरती पर निर्गुण की परंपरा ने साहित्य की गंभीरता के साथ-साथ संगीत की गंभीरता को भी बढ़ाया है. लोक साहित्य की रचना अनुभव से हुई है.


गोरखपुर (ब्यूरो)।भारत के परिप्रेक्ष्य में कलाकारों की अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों के आधार पर तुलना करना ठीक नहीं। लोकसाहित्यों के बारे में गलत अवधारणाएं हैं कि ये या तो मनोरंजन के लिए रचे गए या स्वान्त: सुखाय के लिए रचे गए। यह बातें फेमस फोक सिंगर मालिनी अवस्थी ने कहीं। वह गोरखपुर लिट फेस्ट में 'संगीत का साहित्यÓ टॉपिक पर अपनी बातें रख रहीं थीं। बातचीत की शुरुआत मॉडरेटर मीनू खरे ने संगीत के साहित्य की गंभीरता पर सवाल से की जिसपर मालिनी अवस्थी ने गोरखपुर से अपने जुड़ाव को याद करते हुए जवाब दिया। लोक और बॉलीवुड में दिखाई समानता


उन्होंने कहा कि सच्चाई यह है कि प्राचीन सांस्कृतिक परम्परा से युक्त भारतवर्ष का लोक साहित्य पीढ़ीगत संस्कारों के वहन का प्रतिमान है। उन्होंने सोहर के उदाहरणों से बताया कि कैसे वेदों और पुराणों के सूत्र उनमें समाहित हैं। हिरनी और हिरन के रामजन्म पर आधारित सोहर का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे सोहरों में हमारा संगीत अपने माध्यम से हर अगली पीढ़ी को यह संदेश देता है कि वह मंगल मंगल नहीं हो सकता जो किसी का अमंगल करके के हो। मालिनी अवस्थी ने दर्शकों के बीच अनेक लोकगीतों और बड़े बॉलीवुड गीतों के बीच समानता दिखलाते हुए अनेक सुमधुर गीत सुनाए। सत्र के अंत में उन्होंने रेलिया बैरन और राग भैरवी पर आधारित गीत गाए। पुरस्कार के लिए संगीत साधना नहीं साहित्यकार यतीन्द्र मिश्र ने कहा कि कोई गायक कलाकार या संगीतकार कभी भी पुरस्कार के लिए संगीत साधना नहीं करता। सच्चा कलाकार मंच और यश की एषणा से मुक्त होता है। बिना शब्द के संगीत केवल मात्र अलाप या तराना ही रह जाएगा, इसलिए हर नजरिए से साहित्य और संगीत से जुड़ा हुआ है। विनय पत्रिका के पद गाइये गणपति जगवन्दन और राग बिलावल का उदाहरण देते हुए कहा कि घरानों के संगीत खुद में साहित्य से पूर्ण होते हैं। भारत का मतलब है भाव राग और ताल। संगीत संजीत और शाहिद आपस में दोनों अनु श्रुत हैं और एक दूसरे से मिले हुए हैं। बिना गहराई समझे खारिज करना ठीक नहीं

हर गीत का अपना विशेष प्रतिपाद्य है। संगीत के साहित्य को बिना गहराई से समझे उसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए। हर संगीत किसी उद्देश्य या मनोभाव की अभिव्यक्ति होती है। साहित्य की रागात्मकता लोक साहित्य ने स्वत: ही अपनाई है। आज के लिए यह सुखद आश्चर्य है कि कैसे लोकगीतों में रागों का गूढ़ सरलता से पिरो दिया गया। इनमें इतिहास, समाज, परम्परा और दर्शन सभी शामिल हैं। सत्र का संचालन आशीष श्रीवास्तव ने किया।

Posted By: Inextlive