Lucknow: समय बदला लाइफ स्टाइल बदली और समय के हिसाब से बच्चों की डिमांड भी बदल गयी. पैरेंट्स पहले अपने बच्चों को अच्छे माक्र्स लाने पर रिस्ट वाच या साइकिल दिलाने का वादा करते थे लेकिन अब इलेक्ट्रानिक गजेट्स मोबाइल टैब लैपटाप या बाइक से कम में बात नहीं होती. गजेट्स की बात तो कुछ हद तक सही है लेकिन बाइक से अपनी जिंदगी के साथ दूसरे की जिंदगी को भी यह जोखिम में डालते हैं. पैरेंट्स के लाड और प्यार का उनके लाडले नाजायज फायदा उठा रहे हैं. जिस उम्र में डीएल बनता उस उम्र में बच्चों के हाथ में बाइक आ गयी. नतीजा आये दिन एक्सीडेंट के रूप में सामने आ रहा है.

पहले दिन स्टूडेंट्स के हाथ में दिखी बाइक

मंडे को स्कूलों का पहला दिन था। रोड पर स्कूल बसेस, टैक्सी की कोई कमी नहीं थी साथ ही इस बार ऐसे बच्चों की संख्या ज्यादा दिखी जिनके हाथ में बाइक थी। सिर्फ बाइक ही नहीं थी बल्कि बाइक लड़कियां धड़ल्ले से ट्रिपलिंग कर रहीं थीं.

स्कूलों की भी लापरवाही

मोटे तौर पर माना जाता है कि स्टूडेंट की हाईस्कूल में एज 14 से 15 साल और इंटर के स्टूडेंट्स की एवरेज एज 16 से 17 साल होती है। लेकिन स्कूलों की ओर से इस बारे में कोई डायरेक्शन ना होने का फायदा बच्चे उठाते हैं और वह अपने गार्जियन से जिद कर बाइक हासिल करने में कामयाब हो जाते हैं.

स्टेटस शो करने की होड़

बच्चों के साथ-साथ पैरेंट्स में भी स्टेटस शो करने की होड़ शुरु हो गयी है। बच्चों को पेरेंट्स की ओर से मिल रही आजादी और महज इच्छा जता देने पर ही मनमाफिक चीज मिल जाने से उनकी हिम्मत में इजाफा हो रहा है। समाज में हाई स्टेटस दिखाने की होड़ में पेरेंट्स भी बच्चों के महंगे शौक पूरा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे।

बढ़ रहा है कम्युनिकेशन गैप

आफिस का बोझ, घर की टेंशन ऊपर से आये दिन शादी और दूसरी पार्टियां। इन चीजों में पैरेंट्स के बिजी रहने के कारण पेरेन्ट्स बच्चों के लिए समय नहीं निकाल पाते जिसके कारण उनके व बच्चों के बीच कम्युनिकेशन गैप बढ़ता जा रहा है। ऐसे में बच्चों पर विश्वास करना उनकी मजबूरी होती है। जरूरत से ज्यादा यही विश्वास अब उनके लिये घातक साबित हो रहा है।

पहले सिखायें रूल, फिर दें बाइक

शहर में ट्रैफिक लोड काफी है। जिस उम्र में बच्चों के हाथ में साइकिल होती है उस उम्र में उनके हाथ में बाइक है। जोश और स्पीड दोनों पर काबू करना इनके लिए मुश्किल होता है। ना तो ट्रैफिक नियमों की जानकारी और ना ही गाडिय़ों पर कंट्रोल। यह उन बच्चों के साथ-साथ रोड पर निकलने वाले दूसरे सिटिजन के लिए भी मुसीबत पैदा करते हैं.

क्या कहते हैं अधिकारी

हम लोग बच्चों को बाइक बिल्कुल भी नहंीं एलाऊ करते। जो बच्चे बाइक लाते भी हैं उन्हें हम स्कूलों में नहीं खड़ा करने देते। इसका सर्कुलर ईशू करके बच्चों के पैरेंटस को भी बता देते हैं.

जतिंदर वालिया

प्रिंसिपल, प्राइवेट कालेज.

लाइसेंस बनवाने वाले कंडीडेट की एज 18 साल से कम नहीं होनी चाहिए। उन्हें पॉवर बाइक चलाने की छूट भी नहीं है। ऐसे बच्चों को पॉवर बाइक चलाते हुए मिलने पर उनकी बाइक सीज की जा सकती है.

आरएस त्रिपाठी

आरटीओ प्रभार

Posted By: Inextlive