ऐसे विचार सभी सामान्य लोगों को आते हैं कुछ कंट्रोल कर लेते हैं पर कई इसे कंट्रोल नहीं कर पाते। ये लोग अमूमन सामान्य लोगों के मुकाबले ज्यादा सही-गलत की समझ रखते हैं पर ऐसे विचार आने के कारण खुद को गलत नहीं मानते और बीमारी के कारण इसका अंतर नहीं कर पाते।


लखनऊ (ब्यूरो)। अगर धार्मिक स्थलों पर अपने आसपास मौजूद लोगों को या फिर अपने किसी परिजन को देखकर आपके मन में बार-बार गलत विचार आते हैं, तो इसे महज मन के विचार समझकर नजरअंदाज न करें, क्योंकि यह ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) बीमारी के लक्षण भी हो सकते हैं। एक्सपट्र्स के अनुसार, जब इस तरह के गलत विचार आते हैं, तो लोग यह जानते हुए कि ये विचार गलत हैं, शर्म के कारण उनके बारे में किसी को बताने से डरते हैं। जब समस्या बढ़ जाती है तब वे डॉक्टर के पास जाते हैं। इसके प्रति जागरूकता बेहद जरूरी है। इसका ट्रीटमेंट भी कराया जा सकता है। इस तरह के मामले लगातार केजीएमयू के साइकियाट्रिक विभाग में आ रहे है।मन के विचारों पर कोई कंट्रोल नहीं


केजीएमयू के साइकियाट्रिक विभाग के डॉ। आदर्श त्रिपाठी ने बताया कि ओसीडी बीमारी में ऑब्सेशन और कम्पलशन होता है। आब्सेशन का मतलब एक ही तरह का कोई विचार बार-बार मन में आना होता है। यह विचार सही नहीं है, इसका पता होता है, पर लोग उसको कंट्रोल नहीं कर पाते, जिससे एन्जायटी होने लगती है। इससे काम पर ध्यान न लगना, पढ़ाई में दिक्कत, परेशान रहना, बिजनेस में पीछे होना, रिश्तों पर ध्यान न लगना आदि जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। इसके बाद इन विचारों को कंट्रोल करने के लिए लोग अपना ध्यान हटाने के लिए अन्य चीजों पर जबरदस्ती फोकस करने लगते हैं, जिसे कम्पलशन कहते हैं। ओसीडी अमूमन बार-बार साफ-सफाई करना या बार-बार सामान को ठीक करना से संबंधित ही माना जाता है।तीन प्रकार के लक्षण होते हैंडॉ। आदर्श के मुताबिक, ओसीडी के इन मामलों में तीन अलग-अलग या एक जैसे लक्षण नजर आ सकते हैं। इसमें पहला लक्षण ब्लासफेमी यानि मन में धर्म संबंधित चीजों को लेकर गलत विचार आना होता है। जैसे धार्मिक स्थल पर जाने के दौरान मुंह से कुछ गलत न निकल जाये, ऊपरवाले को कुछ न बोल दूं, कुछ गलत कर न दूं आदि ख्याल आते हैं। इंसान बार-बार मन ही मन माफी मांगता है कि उसकी नियत गलत नहीं है। लोग इसके बारे में अपने परिवार को नहीं बताते हैं और अंदर-अंदर ही परेशान रहते हैं।अपनों को लेकर गलत विचार

दूसरा लक्षण सेक्शुअल ओसीडी से जुड़ा होता है। जिसमें लोगों के मन में यह विचार आता है कि किसी अपने रिश्तेदार को गलत टच न कर दूं, कुछ गंदा न बोल दूं, कोई गलत काम न कर दूं। तीसरा लक्षण, एग्रेसिव थॉट होते हैं, इसमें अपने प्रिय को कुछ नुकसान न पहुंचा दूं जैसे किसी चीज वार करना, बुरा चाहना आदि शामिल होता है। जब वह प्रिय साथ होता है तो भी अकेले रहने की कोशिश करते हैं। इसमें गिल्ट इमोशन बेहद स्ट्रांग होता है, जिसकी वजह से यह समस्या अंदर ही अंदर और बढ़ जाती है।विचार नहीं कर पाते कंट्रोलऐसे विचार सभी सामान्य लोगों को आते हैं, कुछ कंट्रोल कर लेते हैं, पर कई इसे कंट्रोल नहीं कर पाते। ये लोग अमूमन सामान्य लोगों के मुकाबले ज्यादा सही-गलत की समझ रखते हैं, पर ऐसे विचार आने के कारण खुद को गलत नहीं मानते और बीमारी के कारण इसका अंतर नहीं कर पाते। ओसीडी के ये सिम्प्टम ज्यादा देरी से पता चलते हैं। ट्रीटमेंट देरी से शुरू होने के कारण दिक्कतें बढ़ जाती हैं।हर माह 100 से अधिक मामले

डॉ। आदर्श ने बताया कि यह समस्या बच्चों व युवाओं से लेकर बड़ों तक में देखने को मिलती है। हमारे यहां हर माह इस तरह के करीब 100 से अधिक मामले आ रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि हर 100 लोगों में दो को ओसीडी होने की संभावना हो सकती है। जबकि हर 100 ओसीडी मामलों में 10-15 फीसदी में ये लक्षण हो सकते हैं। ऐसे में इसके प्रति लोगों और समाज में जागरूक होने की जरूरत है।कई तरह के ट्रीटमेंट मौजूदडॉ। आदर्श के मुताबिक, ट्रीटमेंट के लिए सबसे पहले समझें कि यह एक बीमारी है। यह बीमारी दिमाग के एक सर्किट के डिस्फंक्शन से होती है, जो जेनेटिक या अन्य कारणों से होता है। इसकी वजह से पीडि़त अपने विचारों को कंट्रोल नहीं कर पाता। हालांकि, जरूरत के अनुसार दवा देकर इसे कंट्रोल किया जा सकता है। दूसरा तरीका ब्रेन स्टीम्यूलेशन होता है। जिसमें चुंबक या लो डोज ऑफ इलेक्ट्रिक करेंट दिया जाता है। तीसरा, कोगनीटिव बिहेवियर थेरेपी (सीबीटी) है, जो एक प्रकार से काउंसलिंग होती है। इसमें सही और गलत विचारों को पहचानने, समझने, अंतर करने और कैसे कंट्रोल करने की ट्रेनिंग दी जाती है।ये दिक्कतें होती हैं-फंक्शन पर प्रभाव-पढ़ाई या आफिस में मन न लगना-चिड़चिड़ापन-आत्महत्या के विचार या कोशिश-अकेला रहने अच्छा लगना-अंदर ही अंदर घुटते रहनाओसीडी के तीन अहम लक्षण बहुत देरी से पता चलते हैं, क्योंकि लोग इसे बीमारी मानते ही नहीं है। लोगों में इसको लेकर जागरूकता होना बेहद जरूरी है।-डॉ। आदर्श त्रिपाठी, साइकियाट्रिस्ट, केजीएमयू

Posted By: Inextlive