क्त्रन्हृष्ट॥ढ्ढ :15 अगस्त पर आज पूरे देश के साथ अपने रांची में भी स्वतंत्रता दिवस उल्लास से मनाया जाएगा. इसमें हर तबके के लिए शामिल रहेंगे. और मिली आजादी को इस दिन खास तरीके से सेलिब्रेट करेंगे. पर एक तबका अपने लिए आज भी 'आजादी' की मांग कर रहा है. पीएम से लगायत हर जगह इनके कठिन राह को आसान बनाने के लिए हर फैसिलिटी के इंतजाम की बात कही जा रही है. लेकिन रांची आज भी बहुत पीछे है. जी हां, राजधानी में रह रहे दिव्यांगों को कॉलेजों में एडमिशन ले पाना भी मुश्किल हो रहा है. यहां इनके लिए अंदर जाने के लिए रैंप है न टॉयलेट. इनकी भाषा को समझने के लिए इंस्ट्रक्टर भी नियुक्त नहीं हैं. कोई सूचना देनी हो तो कॉमन भाषा का ही इस्तेमाल होता है जबकि डिसेबल्ड ब्रेल लिपि में अपनी भाषा समझते हैं. यहां तक कि इनकी काउंसिल के लिए भी अलग इंतजाम नहीं है. इतना ही नहीं दृष्टिबाधित रीडर भी कहीं नहीं हैं. ऐसे में दिव्यांग अपनी इन्हीं जरूरतों के लिए आजादी के 72 साल बाद भी सरकार की ओर टकटकी लगाए हुए हैं.

प्रॉब्लम ही प्रॉब्लम

दिव्यांगों को सिर्फ सरकारी ऑफिसेज और शॉपिंग में ही नहीं, पढ़ाई के लिए भी काफी प्रॉब्लम फेस करनी पड़ रही है. कॉलेजों में दिव्यांगों की कठिन राह को आसान बनाने के लिए किसी भी सुविधा का ख्याल नहीं रखा जा रहा है. इस कारण ये पढ़ाई के लिए कॉलेजों में एडमिशन नहीं ले पा रहे हैं. कॉलेज में डिसेबल्ड के नाम पर सीट तो रिर्जव रखा जाता है लेकिन उनके आने-जाने, बैठने व टॉयलेट के लिए कोई अलग से इंतजाम नहीं किया गया है. इस वजह किए जाने की वजह से ये सीटें खाली रह जाती हैं. शहर के लगभग सभी कॉलेजों में ऐसा ही हाल है. दिव्यांग व्यक्ति चाह कर भी इन कॉलेजों में एडमिशन नहीं ले पाते, क्योंकि इनकी परेशानियों को समझने वाला कोई इंस्ट्रक्टर यहां नहीं. कॉलेज के साथ-साथ बड़े एजुकेशन इंस्टीट्यूट, प्राइवेट शिक्षण संस्थान से लेकर लाइब्रेरी तक में यही हालात हैं. कॉलेजों में बे्रल लिपि में कोई सूचना भी नहीं दी जाती जिससे कि दिव्यांग अपनी भाषा में बातों को समझ सकें.

जेवियर कॉलेज

शहर का सबसे टॉप कॉलेज माने जाने वाले जेवियर कॉलेज में भी दिव्यांगों के लिए प्रॉपर इंतजाम नहीं है. इस कॉलेज में दिव्यांग जनों के चढ़ने और उतरने के लिए स्लोपिंग वे नहीं है. न ही यहां कोई स्पेशल टॉयलेट है और न तो कोई इंस्ट्रक्टर. दिव्यांग हो या सामान्य सभी स्टूडेंट जेवियर में स्टडी करना चाहते हैं लेकिन दिव्यांगों का ये सपना पूरा नही हो पा रहा है, क्योंकि कॉलेज इन्हें लेकर चिंतित ही नहीं है.

मारवाड़ी कॉलेज (ग‌र्ल्स/ब्वॉयज)

मारवाड़ी कॉलेज के ग‌र्ल्स और ब्वॉयज दोनों सेक्शन में दिव्यांग के लिए आने-जाने से लेकर अन्य किसी प्रकार की विशेष सुविधा नहीं दी गई है. कॉलेज की सीढि़या भी काफी बड़ी-बड़ी हैं जिसे पार कर दिव्यांग पढ़ाई करने नहीं जा पाते. वहीं कॉलेज में दिव्यांगों के लिए अलग से टॉयलेट भी नहीं है.

गोस्सनर कॉलेज

गोस्नर कॉलेज की भी स्थिति ऐसी ही है. यहां भी दिव्यांगों की सुविधा के लिए कोई अलग से इंतजाम नहीं है. कॉलेज के अंदर जाने से लेकर क्लास तक में जाने के लिए नहीं है यहां स्लोपिंग वे. दिव्यांगों की बातों को इशारों में समझने के लिए कोई इंस्ट्रक्टर भी नहीं है. दिव्यांगों की भाषा ब्रेल लिपि में किसी प्रकार का कोई नोटिस भी चिपकाया नहीं जाता, जिससे कि दिव्यांगों को कोई जानकारी मिल पाये.

डीएसपीएमयू

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी यूनिवर्सिटी की बात करें तो यहां भी दूसरे कॉलेजों की ही तरह दिव्यांगों के लिए कोई सुविधा नहीं है. इस कॉलेज में दिव्यांग एडमिशन लेना तो चाहते हैं लेकिन व्यवस्था नहीं होने के कारण वे एडमिशन नहीं ले पाते हैं.

रांची कॉलेज

रांची कॉलेज के किसी भी विभाग में दिव्यांगों के लिए प्रोवाइड नहीं की गई है. विभागों में सीढि़यां तो हैं लेकिन स्लोपिंग वे नहीं है. दिव्यांगों के लिए टॉयलेट नहीं है, और इंस्ट्रक्टर भी नहीं हैैं.

सेंट्रल लाइब्रेरी

कॉलेजों के अलावा सेंट्रल लाइब्रेरी की भी हालत ऐसी ही है. दिव्यांग न तो कॉलेजों में एडमिशन ले पा रहे हैं और न ही लाइब्रेरी में बैठ कर पढ़ाई कर सकते हैं. लाइब्रेरी में भी रैंप व टॉयलेट की व्यवस्था नहीं है और न तो उनके समझने के लिए ब्रेल लिपि में लिखी कोई किताब ही उपलब्ध है.