अमेरिका ने समय रहते डेब्ट क्राइसिस से निजात पा ली. बराक ओबामा ने देश की कर्ज की सीमा बढ़ाने को लेकर पेश बिल पर साइन कर दिया. इसके साथ ही अमेरिका पर मंडरा रहा फाइनेंशियल क्राइसिस का संकट टल गया. हालांकि फिच रेटिंग्स के मुताबिक ट्रिपल ए रेटिंग मेंटेन रखने के लिए सिर्फ इतना करना ही पर्याप्त नहीं है. फिच का कहना है कि कर्ज की सीमा बढ़ाने के लिए हुआ एग्रीमेंट और खर्चों में कटौती इस दिशा में एक जरूरी कदम तो है, मगर यह समस्या का अंत नहीं. एक्सपट्र्स के मुताबिक अगर संकट अमेरिका पर आया तो इंडिया भी अछूता नहीं रहेगा. फिच ने यूएस डेब्ट रेटिंग के लिए अगस्त तक का समय तय कर रखा है. फिच के मुताबिक हालिया डेब्ट डील की शर्तों के मुताबिक अगस्त के अंत तक ट्रिपल रेटिंग में गिरावट संभव है.

 

कोई ठोस इंतजाम नहीं

2008 की फाइनेंशियल क्राइसिस के बाद यूएस को इकॉनमी को स्मूथ बनाए रखने के लिए कैश की जरूरत थी. इसके लिए उसने कई ट्रिलियन डॉलर का कर्ज लिया. हालांकि यह भी पर्याप्त साबित नहीं हुआ था. फिलहाल प्रेसीडेंट ओबामा और दूसरे पॉलिटिशियंस ने इस समस्या से छुटकारा तो पा लिया है. मगर फ्यूचर में यह समस्या फिर नहीं होगी बात का कोई ठोस इंतजाम नहीं है.

Effects of India

डोमेस्टिक इकॉनमी पर वल्र्ड इकॉनमी का प्रभाव जरूर पड़ता है. इंडिया में भी देर सवेर अमेरिकन क्राइसिस का इफेक्ट नजर आना तय है. इसकी वजह से अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट और इंपोर्ट दोनों प्रभावित हो सकते हैं. खासकर आईटी सेक्टर में इसका असर हो सकता है. इस बाबत प्राइम मिनिस्टर्स इकॉनमिक एडवाइजरी काउंसिल (पीएमईएसी) के चेयरमैन सी रंगराजन कहते हैं, अमेरिका में कोई भी स्लोडाउन इंडिया में एक्सपोर्ट की एबिलिटी पर असर डालेगा. उन्होंने कहा कि 2008-09 में अमेरिकी मंदी का असर इंडिया के एक्सपोर्ट पर पड़ा था. इसके चलते फॉरेन इंस्टीट्यूशन इनवेस्टर्स (एफआईआई) फंड्स पर भी असर पड़ सकता है.

RBI है तैयार

आरबीआई का कहना है कि अमेरिका में आने वाली किसी भी मंदी से उबरने के लिए देश के पास पर्याप्त लिक्विडिटी है. आरबीआई अचानक से आने वाली ऐसी किसी भी मुसीबत से निपटने के लिए तैयार है. 2008 की तरह इंडिया झटके सहने के लिए तैयार है.

Europe is also not safe

दूसरी तरफ यूरोप में फाइनेंशियल क्राइसिस तेजी से पांव पसारने लगी है. अब इसका कहर ग्रीस, आयरलैंड और पुर्तगाल से बढक़र बड़ी इकॉनमीज इटली और स्पेन की तक पहुंच चुका है. इसने एक बार फिर से ग्लोबल रिसेशन का खतरा पैदा कर दिया है. स्पेन और इटली में बॉरोविंग कॉस्ट पिछले 14 साल की सबसे ऊंचाई पर पहुंच चुका है. इसकी वजह से लंदन, फ्रैंकफर्ट, पेरिस, मिलान और मैड्रिड में स्टॉक मार्केट्स में गिरावट आई है. इटली और स्पेन दोनों जगहों पर बॉरोविंग रेट्स खतरनाक ढंग से बढ़े हैं. यह लगभग 7 परसेंट तक पहुंच चुके हैं. 

"Any slowdown in the US will have an impact on India in terms of our ability to export"- C Rangarajan, Chairman, PMEAC

Posted By: Divyanshu Bhard

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