नैंसी पॉवेल ने दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास में एलान किया कि वो पहले से तय योजना के तहत मई के आख़िर में सरकारी नौकरी से अवकाश ले रही हैं और उन्होंने राष्ट्रपति ओबामा को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है.

भारतीय मीडिया में पहले से ये ख़बरें चल रही थीं कि नैंसी पॉवेल को भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की गिरफ़्तारी से उपजे तनाव और बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के बुलंद होते सितारों का सही आकलन नहीं कर पाने का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.

अमरीकी विदेश विभाग ने उन ख़बरों को निराधार बताते हुए कहा था कि राष्ट्रपति ओबामा को पॉवेल की काबिलियत पर पूरा भरोसा है.

सोमवार को भी विदेश विभाग की प्रवक्ता मैरी हार्फ़ ने उन ख़बरों का खंडन किया.

उनका कहना था कि इस रिटायरमेंट का भारत की चुनावी तारीख से कोई लेना देना नहीं है. ये पहले से ही तय था और पॉवेल 37 साल की कामयाब नौकरी के बाद अवकाश ले रही हैं और डेलावेयर स्थित अपने घर को लौट रही हैं.

असाधारण क्षण

विदेश विभाग में उच्च पद पर काम कर चुके एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि अमरीकी सरकार समय से पूर्व अपने राजदूत को हटाने का फ़ैसला बहुत ही असाधारण स्थिति में करती है.

उन्होंने बताया कि विकीलीक्स के दौरान जब कुछ गोपनीय अमरीकी दस्तावेज़ लीक हुए थे तो उनमें कुछ राजदूतों को हटाया गया था क्योंकि वहां की सरकारों ने उन राजदूतों के साथ काम करने से साफ़ इंकार कर दिया था.

उनका कहना था कि पॉवेल के मामले में ऐसा होता हुआ नहीं लग रहा क्योंकि चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण की मानें तो मौजूदा सरकार के लौटने की संभावना कम है और ऐसे में राजदूत को बदलने के लिए दबाव डालना उनकी प्राथमिकता नहीं होगी. नई सरकार का स्वरूप क्या होगा ये अभी कहीं से तय नहीं है तो उनकी भी कोई भूमिका नहीं नज़र आती.

उनका कहना था कि जहां तक नरेंद्र मोदी को वीज़ा नहीं दिए जाने का सवाल है या उनसे संपर्क करने में देर करने की बात है तो उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ राजदूत की नहीं थी.

लेकिन वाशिंगटन स्थित विश्लेषक ये ज़रूर कह रहे हैं कि अगर भारत में एक नई सरकार आती है तो नए राजदूत के लिए नई शुरूआत करना आसान होगा.

लेकिन वहीं कुछ लोगों का कहना है कि नए राजदूत की नियुक्ति में महीनों लग सकते हैं.

उनका कहना है कि जब तक ओबामा नए नाम का एलान करेंगे उसके कुछ ही हफ़्तों में अमरीकी कांग्रेस का सत्र खत्म होने को होगा और फिर अमरीका में भी कांग्रेस के चुनाव की सरगर्मी तेज़ हो जाएगी जिस दौरान प्रशासन की नई नियुक्तियों को मंज़ूरी मिलना बेहद मुश्किल हो जाता है.

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