- हैनिमेन जयंती पर स्पेशल

- डॉ। हेमंत बनर्जी ने गोरखपुर में रखी थी होम्योपैथी की नींव

- हैनिमेन ने होम्योपैथी को ऑथराइजेशन दिलाने के लिए खूब लड़ी लड़ाईयां

GORAKHPUR : होम्योपैथी, इलाज करने की एक तरकीब, जिससे बीमारी फौरी तौर पर नहीं बल्कि पूरी तरह से खत्म हो जाती है। इसमें वक्त जरूर लगता है, लेकिन इसका रिजल्ट श्योर शॉट रहता है। शहर में भी होम्योपैथी फील्ड के जहां दिग्गज मौजूद हैं, तो वहीं इसके कद्रदान की भी कोई कमी नहीं है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर एंसियंट पीरियड में देसी नुस्खों के बीच कैसे इलाज के इस तरीके ने सर्वाइव कैसे कया? आखिर कैसे गोरखपुराइट्स इलाज की इस नायाब तरकीब से रूबरू हो सके। होम्योपैथी के पितामाह कहे जाने वाले हैनिमेन की जयंती पर आई नेक्स्ट ने गोरखपुर में होम्योपैथी की नींव कैसे पड़ी इसको लेकर इनवेस्टिगेशन की और पता लगाया कि छोटी-छोटी मीठी गोलियां, जिससे हर बीमारी पनाह मांगती है, वह गोरखपुर तक कैसे पहुंची।

एलोपैथी हब में भी होम्योपैथी हिट

गोरखपुर, एलोपैथी फील्ड का सबसे बड़ा हब माना जाता है। पूर्वाचल में यहां से बड़ी दवा मंडी कहीं भी नहीं है, मगर इसका सबसे बड़ा ड्रॉ बैक यह है कि एलोपैथी से इलाज कराना सभी के बस में नहीं है। शहर की इस परमनेंट समस्या को सॉल्व करने के लिए अगर किसी ने कदम बढ़ाया तो वह है शहर के सबसे फेमस और पहले होम्योपैथी स्पेशलिस्ट डॉक्टर हेमंत कुमार बनर्जी ने। यह उन्हीं की देन है कि आज गोरखपुर में होम्योपैथी से इलाज हो रहा है और हजारों लोगों को कम पैसे में बीमारी से परमानेंट छुटकारा भी मिल रहा है।

क्900 से गोरखपुराइट्स खा रहे हैं मीठी गोलियां

इलाज के लिए सबसे सस्ती और असरदार होम्योपैथी की गोलियां गोरखपुराइट्स सन् क्900 से खाते आ रहे हैं। गोरखपुर में डॉ। अमूल्य रतन बनर्जी के साथ ही होम्योपैथी ने भी गोरखपुर में कदम रखा है। शुरुआती दिनों में डॉ। अमूल्य घर के दालान (बरामदे) में ही दरी लगाकर मरीजों को देखा करते थे। किसी मरीज से वे कोई पैसा नहीं लेते थे। हां, जो मरीज ठीक हो जाता वह खुद ही डॉक्टर साहब को जरूरत के सामान पहुंचा दिया करता था। शुरुआती दौर में लोगों को होम्योपैथी से फायदा तो मिलने लगा था, लेकिन उन्हें इलाज की इस तरकीब पर पूरी तरह से भरोसा नहीं हुआ था।

डॉ। हेमंत कुमार ने दिलाई पहचान

इलाज के लिए होम्योपैथी से दूर रहे लोगों को करीब लाने का काम डॉ। हेमंत बनर्जी ने किया। क्9क्फ् में पैदा हुए डॉ। हेमंत ने कोलकाता होम्योपैथी कॉलेज से होम्योपैथी के गुर सीखे। उन्होंने वापस गोरखपुर को ही सेवा के लिए चुना और यहां आकर उन्होंने अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी। उनके ही प्रयासों का नतीजा है कि होम्योपैथी को मीठी गोली, साबूदाना कहने वाले लोगों ने भी होम्योपैथी को स्वीकार करना शुरू कर दिया। इसके बाद डॉ। हेमंत पूर्वाचल में होम्योपैथी की अलख जगाने वाले डॉक्टर के तौर पर पहचाने जाने लगे। इसके बाद उनके पुत्र डॉ। राम रतन बनर्जी भ्म् सालों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं और हैनिमेन के पदचिन्हों पर चलकर नई रिसर्च में लगे हुए हैं।

कौन हैं हैनिमेन?

होम्योपैथी, इलाज की एक ऐसी तरकीब है, जिससे मुश्किल से मुश्किल इलाज पॉसिबल है। क्0 अप्रैल क्7भ्भ् में जर्मनी के मेंसिन शहर में गौर फ्राइड हैनिमेन के घर एक लड़का पैदा हुआ। क्रिश्चियन फ्रेडरिक सेमुएल हेनिमैन, होनहार इतना कि क्ख् साल में कॉलेज में एडमिशन लेने के बाद ख्0 साल की उम्र में लेपजिंग यूनिवर्सिटी में जगह बना ली। हायर स्टडीज के लिए वह लेपजिंग से वियेना गए। क्779 में उन्होंने मेडिकल फील्ड में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। उन्होंने क्780 में अपनी प्रैक्टिस स्टार्ट कर दी। उस दौर में मेडिकल फील्ड में अराजकता चरम पर भी थी। इसकी वजह से उन्होंने प्रैक्टिस छोड़ दी। निराशा में आशा की किरण ढूंढने निकले हैनिमेन ने चिकित्सा में समानता के नियम पर विचार किया। इस दौरान उन्होंने क्79म् में अरोग्य के नियम की सार्वजनिक घोषणा की और होम्योपैथी की शुरुआत हुई। होम्योपैथी की मान्यता को प्राप्त कराने का संघर्ष हेनिमैन की नई रिसर्च के साथ चलता रहा। जून क्8ख्क् में एलोपैथ, फार्मासिस्ट और सरकारी अधिकारियों के विरोध केबीच हेनिमैन को होम्योपैथी प्रैक्टिस की अनुमति मिली।

देश में होम्योपैथी के प्रमुख एजुकेशनल इंस्टीट्यूट

-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ होम्योपैथी, कोलकाता।

-मोती लाल होम्योपैथिक मेडिसिन कालेज, नासिक।

-राजस्थान विद्यापीठ होम्योपैथिक मेडिकल कालेज एंड हास्पिटल, उदयपुर (राजस्थान)।

-एएम शेख मेडिकल कालेज बेलगाम, कर्नाटक।

-भारती विद्यापीठ होम्योपैथिक मेडिकल कालेज, पुणे।

-नेहरू हास्पिटल एंड मेडिकल कालेज ऑफ होम्योपैथी, नयी दिल्ली।

-गवर्नमेंट होम्योपैथिक मेडिकल कालेज, बंगलूर।

होम्योपैथिक दवाओं में यूज होने वाले एलीमेंट

गंधक, चूना, तांबा, पारा, संखिया, जस्ता, टिन, बेराइटा, सोना, चांदी, लोहा जैसे तत्वों से होम्योपैथिक दवाओं का निर्माण होता है।

क्यों है बेहतर है दूसरी चिकित्सा पद्धतियों से?

-बाकी पद्धतियों के मुकाबले इसमें दवाइयां सस्ती।

-रोग की जांच के लिए महंगे टेस्ट नहीं।

-रोगी के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत किया जाता है ताकि वह स्वयं रोग से लड़ सके।

-होम्योपैथिक दवाओं का साइड इफेक्ट नहींहै।

-होम्योपैथी से कुछ ऐसी असाध्य बीमारियों का इलाज संभव है, जो दूसरी चिकित्सा पद्धतियों में नहीं है।

- इसमें रोग बिना किसी चीरफाड़ के ठीक किए जाते हैं।