अन्य किसी भी समुदाय की तरह मुसलमान समाज में वैवाहिक समस्याओं से जुड़े मामले समय-समय पर मौजूदा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं। साथ ही व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को भी बढ़ाते हैं।

एक ऐसी समस्या जिससे कई मुसलमान महिलाओं को दो चार होना पड़ता है, वो ये है कि महिलाएं अगर किसी कारण से अपने पति से अलग होना चाहती हैं तो उनके लिए यह उस समय तक संभव नहीं है जब तक कि उनका पति इसके लिए रज़ामंद न हो। हालाँकि पति जब चाहे तलाक दे सकता है।

दूसरी तरफ़ अगर पत्नी स्वयं ही अलग होना चाहती हो- जिसे शरियत की जुबान में "ख़ुला" कहते हैं - तब भी उसके लिए पति की अनुमति या रज़ामंदी की ज़रुरत होती है। उसके बिना क़ाज़ी भी उस विवाह को भंग या रद्द घोषित नहीं करता।

शरियत क़ानून

शरियत के अनुसार अगर कोई पति तलाक़ देता है तो फिर उसे महिला को मेहर की राशि अदा करनी होती है। वो पत्नी को दी हुई कोई चीज़ वापस नहीं ले सकता। अगर पत्नी ख़ुला चाहती है तो यह पति के लिए ज़रूरी नहीं है कि वो मेहर अदा करे। इसी वजह से हैदराबाद में मुसलमान महिलाओं की एक बड़ी संख्या अपने भविष्य को लेकर चिंतित है।

इनमें से ज़्यादातर महिलाओं के पति उनकी ठीक तरह से देखभाल नहीं करते और न ही उन्हें तलाक़ देना चाहते हैं। एक निजी स्कूल की अध्यापिका कुदसिया बेग़म ऐसी महिलाओं की समस्याओं की एक प्रतीक बन गई है।

वो पिछले छह-सात वर्षों से अपने पति से अलग होने की लड़ाई लड़ रही है जो विवाह के बाद से ही उन्हें ज़्यादा दहेज न लाने पर सताता रहा है।

'पति नही करते देखभाल'

महिला का कहना है कि वो ससुराल पक्ष के ज़ुल्म से तंग आकर एक वर्ष के भीतर ही अपने मायके लौट आई थी जिसके बाद उन्होंने अपने पति और ससुराल वालों के ख़िलाफ़ दहेज मांगने का मामला भी दर्ज करवाया।

इसके बाद से ही वो ये मांग कर रही है कि उनका पति उन्हें तलाक दे या उनका ''ख़ुला'' स्वीकार कर ले, पर छह साल बाद भी वो इसमें सफल नहीं हो सकी हैं। कुदसिया के मुताबिक़ उनके पति ने उनकी और बच्चे की देखभाल के लिए कुछ भी नहीं किया।

कुदसिया ने कहा, "ऐसा लगता है कि मेरे पति ने मुझे सताने की ज़िद्द पाल रखी है। न तो वो मुझे अपने साथ रखना चाहते हैं और ना ही छोड़ना चाहते हैं। अदालत में पांच साल से मामला चल रहा है लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला। मेरी समझ में नहीं आ रहा है की मैं क्या करूँ."

सामाजिक कार्यकर्ता और कुदसिया के पिता मोईनुद्दीन ने कहा, "मेरी असल लड़ाई क़ाज़ी और उन धार्मिक लोगों से है जो यह काम कर सकते हैं लेकिन ख़ामोश तमाशा देख रहे हैं। आख़िर मेरी बेटी और ऐसी दूसरी महिलाओं का क्या होगा। क्या वो इसी तरह बैठी रहेंगी ? अगर इनकी पहली शादी नहीं टूटती है तो वो दूसरी शादी नहीं कर सकतीं."

कार्रवाई

मुसलमान पर्सनल लॉ बोर्ड को भारत में मुसलमानों के धार्मिक और पारिवारिक मामलों में सबसे बड़ा प्रतिनिधि माना जाता है। उसका भी यह कहना है कि ऐसे मामलों में क़ाज़ी हस्तक्षेप करके न्याय संगत कार्रवाई कर सकते हैं और निकाह को भंग कर सकते हैं।

बोर्ड के सचिव मौलाना अब्दुल रहीम कुरैशी का कहना है कि शरियत क़ाज़ियों को इस तरह की कार्रवाई की इजाज़त देती है। उनके अनुसार कई राज्यों में क़ाज़ी या फिर मुसलमान बोर्ड के बनाए हुए "दारुल क़ज़ा" या शरई काउंसिल ऐसे मामलों को सुलझा रहे हैं। लेकिन ज़मीनी सच्चाई ये है कि अधिकतर क़ाज़ी ऐसा करके क़ानूनी उलझनों में पड़ने से बचना चाहते हैं।

छह साल से अपने पति से अलग होने की कोशिश कर रही एक और महिला हाजिरा मसूद को भी अब तक तलाक़ नहीं मिल पाया है। हाजिरा के मुताबिक़ वो तीन वर्षों से क़ाज़ियों और मुफ़्तियों के कार्यालयों का चक्कर काट रही हैं, लेकिन उन्हें कहीं से भी कोई मदद नहीं मिली। हाजिरा ने कहा, "मेरे लाख गिड़गिड़ाने के बावजूद कोई भी मेरी मदद नहीं कर सका."

निकाह रद्द करने का अधिकार

हैदराबाद के मुख्य क़ाज़ी मीर मोहम्मद रज़्ज़ाक़ अली ने कहा, "125 वर्ष पहले जब अदालतें बनीं थीं तब ही क़ाज़ी से निकाह रद्द करने का अधिकार छीन लिया गया था। अगर हमें यह अधिकार वापस मिलता है तो सताई हुई महिलाओं को काफ़ी राहत मिल सकती है।

आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के कई इलाक़े जो पहले हैदराबाद के निज़ाम के राज्य में था वहाँ अभी तक पुरानी व्यवस्था चल रही है जिसमें क़ाज़ी की नियुक्ति राज्य सरकार करती है।

आंध्र प्रदेश में क़ाज़ी की नियुक्ति का काम अल्पसंख्यक कल्याण विभाग करता है। इस विभाग के सचिव मोहम्मद अली रफ़त कहते हैं कि अगर पति तलाक़ और 'ख़ुला' से इनकार कर दे तो महिला के पास अदालत जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता।

लेकिन कुदसिया और हाजिरा जैसी महिलाओं को अदालत पर भरोसा नहीं है और वो समझती है कि वहाँ से न्याय मिलने में इतना समय लग जाएगा कि उनका कोई भविष्य ही नहीं रहेगा।

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