देहरादून,(ब्यूरो ): दून फायर स्टेशन में मौजूद जिन फायर वाहनों के कंधों पर करीब 15 लाख आबादी के शहर में आग बुझाने का जिम्मा है। वे बूढ़े हो चुके हैं। उनकी उम्र सीमा उम्मीद से ज्यादा पार हो चुकी है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि आखिर उन पर आग बुझाने का कैसे भरोसा किया जा सकता है। एक पल के लिए आपको यकीं न हो। लेकिन, ये सच है। हद तो ये हो गई है कि फायर स्टेशन में खड़ी आग बुझाने वाली बड़ी 8 गाडिय़ों में से 6 की उम्र सीमा करीब 25 वर्ष तक पहुंच गई है। नतीजतन, अब फायर स्टेशन के अधिकारी आरटीओ से परमिशन तक लेने में हिचकिचा रहे हैं।

6 वाहनों की मियाद 25 वर्ष पार
राजधानी दून शहर की आबादी एक अनुमान के मुताबिक करीब 15 लाख तक बताई जा रही है। ऐसे में गर्मी का सीजन हो फिर आम सीजन। शहर के किसी इलाके में आग लग जाए तो आग बुझाने के लिए तहसील रोड स्थित फायर स्टेशन पर 8 बड़े फायर वाहन हर वक्त खड़े रहते हैं। ये वाहन दूर से देखने पर यकीनन बेहतर स्थिति के साथ चमकीले नजर आते हैं। लेकिन, इनकी हकीकत कुछ और है। इन 8 वाहनों में से 6 वाहन ऐसे हैं, जो एक-दो साल नहीं, बल्कि अपनी उम्र की सीमा 25 साल पूरे कर चुके हैं। साफ है कि आज भी विभाग ने इनके कंधों पर इतने बड़े शहर में आगजनी की घटनाओं पर नियंत्रण पाए जाने का जिम्मा सौंपा है।

फिटनेस पर भी सवाल
बताया जा रहा है कि इन 6 फायर वाहनों को आरटीओ तक से फिटनेस नहीं मिल पा रही है। भला, मिलेगी भी कैसे। आम गाडिय़ां होती तो कब के आरटीओ ऑफिस इन पर कार्रवाई कर देता। लेकिन, फायर की गाडिय़ां हैं, काम चल रहा है और चलते रहेगा। खास बात तो ये है कि अब दून फायर स्टेशन के अफसर इन एक्सपायरी डेट के इन फायर वाहनों के फिटनेस सर्टिफिकेट लेने के लिए आरटीओ ऑफिस जाने तक के लिए कतरा रहे हैं। जबकि, आरटीओ के नियमानुसार एक वाहन की मैक्सिमम आयु सीमा 10 वर्ष तय है।

इन जीर्ण-शीर्ण वाहनों से हो रही दिक्कतें
-हर बार मेंटनेंस के खर्च की जरूरत
-विभाग की ओर से नहीं मिल पा रहा खर्चा।
-दून फायर स्टेशन अपनी पॉकेट मनी से कर रहा खर्च
-सूचना मिलने व फर्राटे भरने पर अक्सर रहता है खतरा।
-कई बार इंजन खराब होने, ब्रेक फेल होने का भी खतरा।
-फायर स्टेशन व चालक उठाते हैं अक्सर रिस्क।

घटना घटी तो फंसेगा चालक
इन उम्रदराज वाहनों की सच्चाई ये भी है कि आग लगने की सूचना मिलने पर कई बार एक्सीडेंट का भी खतरा बन जाता है। ऐसे में कोई और नहीं, जिम्मेदारी फायर वाहन चालक के ऊपर थोप दी जाती है।

वीआईपी मूवमेंट में भी खतरा
दून में अक्सर वाईपी मूवमेंट भी बना रहता है। ऐसे में आम हो या फिर वाआईपी। हर तरफ ये वाहनों की ड्यूटी रहती है। जिसको लेकर फायर स्टेशन हमेशा आशंकित बना रहता है। बावजूद इसके इन वाहनों के बारे में विभाग के अलावा शासन स्तर पर कोई विचार नहीं किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि फायर स्टेशन से जुड़े कर्मचारियों को पास में ही रेजिडेंस की सुविधा भी नहीं मिल पाई है। जिससे वे आग लगने की सूचना मिलने पर तत्काल मौके लिए रवाना हो सकें।

आग की घटनाओं पर एक नजर
-अप्रैल माह में फायर स्टेशन को मिली आग की 114 सूचनाएं।
-डेली होने वाले फोन कॉल्स की संख्या 3 से लेकर 4 तक
-फायर सीजन 15 फरवरी से लेकर 15 जून तक
-फायर सीजन में प्राप्त होने वाले फोन कॉल्स 10 से 15 तक

वाटर लॉगिंग, आंधी-तूफान में भी रहते हैं तैयार
दून फायर स्टेशन में अकेले आग पर नियंत्रण पाने में ही आगे नहीं रहता है। बल्कि, अब तो कई अन्य प्रकार के रेस्क्यू में भी फायर ब्रिगेड आगे रहती है। इसमें वाटर लॉगिंग हो या फिर आंधी-तूफान में पेड़ गिरने की सूचना हो। सभी में फायर स्टेशन के कर्मी बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।

122 हॉस्पिटल व 500 बड़ी बिल्डिंग्स को एनओसी
दून में लगातार बढ़ रही मल्टीस्टोरी बिल्डिंग को एनओसी दिए जाने पर भी हमेशा सवाल उठते रहे हैं। विभाग के मुताबिक राजधानी में इस वित्तीय वर्ष के आंकड़ों के मुताबिक 122 हॉस्पिटल व करीब 500 बड़ी बिल्डिंग्स को फायर की ओर से एनओसी दी गई है।

एनओसी के बाद गड़बड़
ये भी बताया जा रहा है कि फायर से एनओसी लेने वाले शुरुआत में बिल्डिंग के नाम पर एनओसी ले लेते हैं। लेकिन, बाद में वे इस बिल्डिंग का प्रयोग दूसरे इंस्टीट्यूशंस व हॉस्पिटलों के लिए करते हैं। ऐसे में इन पर नियंत्रण पाया जाना कई बार मुश्किल हो जाता है।

बिहार तक से आ रही कॉल्स
दून फायर स्टेशन में अकेले दून ही नहीं, बल्कि अब तो बिहार तक से आग लगने की सूचनाओं के फोन आ जाते हैं। जिससे कार्मिक कई बाद दुविधा में पड़ जाते हैं।

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