भारत ही नहीं विश्व में जहां भी विश्वकर्मा को मानने वाले हैं, वह 17 सितंबर को अनकी पूजा-अर्चना करके उनका जन्मोत्सव मना सकते हैं। कल कारखाने, फैक्ट्री या निर्माण ईकाइयों में भगवान विश्वकर्मा का बड़ा सा चित्र लगाकर उनकी पूजा की जाती है। समस्त औजारों की पूजा भी साथ ही होती है।

ये है भगवान विश्वकर्मा के जन्म की कहानी

सृष्टि संवारने की जिम्मेदारी भगवान विश्वकर्मा की है। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा को अपना वंशज भगवान विश्वकर्मा की कला और निर्माण क्षमता पर पूर्ण विश्वास था, जब उन्होंने सृष्टि का निर्माण किया तो सृष्टि एक विशालकाय अंडे के रूप में थी और उस अंडे से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। जिसे ब्रह्माजी ने शेषनाग की जीभ पर रख दिया।

भगवान ब्रह्मा को पसंद आई विश्वकर्मा की शिल्पकला

शेषनाग के हिलने-डुलने से सृष्टि को नुकसान पहुंचता था। इससे चिंतित होकर ब्रह्मा जी ने विश्वकर्मा से सृष्टि को स्थिर रखने का उपाय पूछा। इस पर भगवान विश्वकर्मा ने मेरू पर्वत को जल में रखवा कर सृष्टि को स्थिर बनाया। बस इसके बाद ब्रह्मा को भगवान विश्वकर्मा की कला और निर्माण क्षमता पर अत्यंत प्रभावित हुए और शिल्पकला का स्वामी बना दिया। छोटी सी छोटी दुकानों में भी भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है।

-पंडित दीपक पांडेय

Spiritual News inextlive from Spiritual News Desk