शिवाला में मद्रासी बन घूमता था यासीन
भटकल ने साउथ इंडियन इलाकों में ठिकाना बना कर की थी रेकी
इंडियन मुजाहिदीन के फाउंडर मेम्बर यासीन भटकल को भले ही बिहार पुलिस ने नेपाल बॉर्डर से पकड़ा हो लेकिन आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि भटकल ने अपने बनारस शहर में बड़ा लंबा वक्त बिताया है. ये बातें हम नहीं बल्कि खुद खुफिया विभाग के लोग बता रहे हैं. इंटेलिजेंस के सोर्सेज बताते हैं कि भटकल ने बनारस में 2005 से लेकर 2010 के बीच हुए धमाकों के लिए बनारस में लंबा टाइम स्पेंड किया था. चूंकि भटकल कर्नाटक का रहने वाला था इसलिए उसने अपने रहने के लिए बनारस में साउथ इंडियंस के इलाके शिवाला को ही चुना था. चंूकि ये इलाका मुस्लिम बस्ती से मिला हुआ है इसलिए उसे दोनों तरह का एडवांटेज मिलता था. सोर्सेज की मानें तो भटकल शिवाला के अलग अलग गेस्ट हाउसेज में नाम और पहचान बदलकर काफी लंबे वक्त तक न सिर्फ रहा बल्कि उसने यहां स्लीपिंग माड्यूल तैयार करने के आलावा आजमगढ़ के कई और दूसरे लड़कों को भी आतंक की आग में झोंक दिया.

बनारस से बनाई टीम

इंटेलीजेंस सोर्सेज की मानें तो यासीन भटकल ने बनारस को अपने ऑपरेटिंग सेंटर के रुप में सेलेक्ट किया था. 2002 में कोलकाता के अमेरिकन ट्रेड सेंटर में हुए ब्लास्ट के बाद पहली बार आंतक के रुप में सामने आये भटकल ने बनारस को सिर्फ इसलिए सेलेक्ट किया क्योंकि पुलिस ने इस ब्लास्ट केस में शामिल लल्लापुरा के आफताब को भी यासीन संग कोलकाता से अरेस्ट किया था लेकिन उस वक्त सबूत न मिलने के चलते भटकल को जमानत पर रिहा कर दिया गया. इसके बाद भटकल ने आजमगढ़ पहुंच आजमगढ़ संगठन के नाम से एक संगठन बनाया जिसे बाद में आईएमए के नाम से जाना गया. सोर्सेज बताते हैं कि भटकल ने आजमगढ़ संगठन बनाने के बाद बनारस में डेरा डाला था और यहीं से आतंक की शुरुवात की थी.


पहला धमाका दशाश्वमेध
बनारस में रहते हुए ही भटकल ने अपने आतंक की जड़ों को मजबूत करने की ठानी और 23 फरवरी 2005 को दशाश्वमेध घाट पर पहले बम धमाके को अंजाम दिया लेकिन उस वक्त पुलिस को जल्दीबाजी के चलते पहले तो इस ब्लास्ट को सिलिंडर ब्लास्ट का नाम दिया गया लेकिन बाद में इस ब्लास्ट में आतंक के नये संगठन आईएमए का नाम सामने आया और ब्लास्ट करने वालों में इस संगठन के फाउंडर मेम्बर यासीन भटकल को ही खुफिया एजेंसियों ने इस धमाके का आरोपी बताया. इसके बाद यासीन भटकल ने बनारस को एक साल बाद फिर से दहलाया और फिर सात मार्च 2006 को संकटमोचन मंदिर और कैंट स्टेशन पर सीरियल ब्लास्ट को अंजाम दिया. इन धमाकों में 27 लोगों की जानें गई और सैकड़ों लोग घायल हुए. भटकल का बनारस में रहकर बनारस को दहलाने का सिलसिला यहीं नहीं थमा और उसने एक बार फिर से 23 नवंबर 2007 को कचहरी और फिर सात दिसम्बर 2010 को शीतलाघाट में ब्लास्ट कर कई लोगों की जान ली.


कई को दी यहां पर ट्रेनिंग
यासीन भटकल के बारे में खुफिया विभाग के अधिकारी बताते हैं कि भटकल अपनी पहचान छुपाने के लिए बनारस के ही शिवाला घाट पर कई गेस्ट हाउसेज में रहा. 2005 से बनारस में शुरू किये आतंक के खेल को बनारस में 2010 में शीतला घाट में ब्लास्ट करने के लिए रियाज ने अपने साउथ इंडियन होने का पूरा फायदा उठाया था. दक्षिण भारतीय गेटअप में कन्नड़ बोलते हुए साउथ इंडियंस संग घुल मिलकर रहता था. वैसे इलाके के लोग उसे मद्रासी मानते थे. अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ होने के कारण भटकल ने बनारस में कई फॉरेनर्स से भी दोस्ती की थी. सोर्सेज की मानें तो यासीन भटकल ने 2005 से 2010 तक बनारस में रहते हुए सैकड़ों स्लीपिंग माड्यूल तैयार किए और उनका इस्तेमाल बनारस के चार बड़े धमाकों को अंजाम देने के लिए भी किया. लोकल एटीएस और खुफिया विभाग के सोर्स बताते हैं कि यासीन ने ही संजरपुर के सैफ को तैयार कर श्रमजीवी में ब्लास्ट और कचहरी में ब्लास्ट कराया था. सोर्स ये भी बताते हैं कि यासीन ने ही बनारस में रहते हुए सलमान नाम के आंतकी को टिफिन बम बनाने की ट्रेनिंग दी थी और कचहरी में साइकिल पर टिफिन टंगवाकर कचहरी ब्लास्ट को अंजाम दिया था. संकटमोचन में हुए धमाकों के मेन कलप्रीट वलीउल्लाह ने भी पूछताछ में यासीन भटकल की सरपरस्ती की बात एक्सेप्ट की थी.

बीच चौराहे पर मार दो गोली
ङ्क्रक्र्रहृ्रस्ढ्ढ : यासीन भटकल के पकड़े जाने के बाद खुफिया विभाग अपनी पीठ थपथपा रहा हो लेकिन क्या महज भटकल के गिरफ्त में आने के बाद उन पीडि़तों को इंसाफ मिल पायेगा. जिन्हें भटकल ने एक के बाद एक धमाके करवाकर चोट दी, क्या उनके जख्म भर जाएंगे? शायद नहीं. फिलहाल अपने बनारस में हुए धमाकों के कुछ पीडि़तों का ऐसा ही मानना है. कचहरी, दशाश्वमेध और संकटमोचन मंदिर में हुए आतंकी विस्फोटों में शहर के सैकड़ों परिवार तबाह हुए. कईयों की जान गई और कई आज भी धमाकों के दर्द को अपने दिल में दबाये जी रहे हैं. ऐसे ही कुछ लोगों से आई नेक्स्ट ने पूछा कि क्या यासीन भटकल की गिरफ्तारी ही पर्याप्त है? हमारे इस सवाल के जवाब में पीडि़तों ने बस एक ही जवाब दिया भटकल को बीच चौराहे पर गोली मार देनी चाहिए...

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मेरा बस चले तो मैं उसे चौराहे पर खड़ा करके गोली मार दूं. इस जैसे आतंकवादी के चलते मैं पिछले आठ बरस से बिस्तर पर हूं. मेरा कहना है कि सरकार को इसके बारे में कोई भी छानबीन नहीं करनी चाहिए. वरना इसे दो तीन साल की जिंदगी और मिल जायेगी.
राजू साहनी, पीडि़त दशाश्वमेध बम ब्लास्ट


अब भटकल का ट्रायल जल्दी से शुरू करा कर उसे सजा देनी चाहिए. उस जैसे टेरेरिस्ट के लिए मौत से कम सजा कोई हो ही नहीं सकती. उसे जल्द कोर्ट में पेश किया जाये और उसकी जिंदगी का फैसला जल्द किया जाय. क्योंकि उसे जिंदा रखने पर बेवजह सरकार का पैसा खर्च होगा.
वशिष्ठ कुमार मिश्रा, पीडि़त कचहरी बम ब्लास्ट


भटकल के लिए तो सिर्फ मौत है. लेकिन यह मौत उसे जल्दी मिले तो जाकर बात बने. ट्रायल में लंबा वक्त लगे फिर जाकर उसकी सजा मुकर्रर हो फिर प्रेसिडेंट के पास मामला जाये. इस तरह तो उसकी लाइफ बढ़ाने वाली बात हो जायेगी. जिसने सैकड़ों की जान ली हो उसे एक पल भी जिंदा रहने का हक नहीं है.
बृजेश कुमार शर्मा, पीडि़त कचहरी बम ब्लास्ट  


मौत की सजा तो भटकल के लिए छोटी होगी. कोई इससे भी बड़ी सजा हो तो वह उसके लिए ठीक रहेगी. जिंदगी भर का दर्द दिया है इसने. इसका जल्दी से जल्दी फैसला हो बस. हमारा दर्द ठीक तो नहीं हो सकता लेकिन इसे कम करने के लिए भटकल की मौत ही इसकी दवा है. वह भी जल्दी से जल्दी.
शैलेन्द्र श्रीवास्तव, पीडि़त कचहरी बम ब्लास्ट


भटकल की अरेस्टिंग ने बढ़ा दी धुकधुकी

हमेशा से आंतकियों के निशाने पर रही काशी को भटकल की अरेस्टिंग के बाद खतरा है. इंटेलीजेंस सोर्सेज की मानें तो क्योंकि यासीन ने बनारस से ही धमाकों को अंजाम देने की शुरुवात की थी. इसलिए उसके पकड़े जाने के बाद ये डर बढ़ गया है कि कहीं आंतकी बनारस को फिर से टारगेट पर न ले लें. इस लिए बनारस में सिक्योरिटी को टाइट कर दिया गया है. एडीजी/आईजी जीएल मीणा की मानें तो बनारस में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम है और आंतकियों से लडऩे के लिए एटीएस और खुफिया विभाग की टीमों को लगाया जा चुका है.