- शहीद भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त के माथे पर अपने लहू का तिलक लगाया था दुर्गा भाभी ने

- 9 अक्टूबर, 1930 को दुर्गा भाभी ने गवर्नर हैली पर दागी थी गोली

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LUCKNOW: देश के क्रांतिकारी संघर्ष का अवध एक अहम गवाह है. यह वही धरती है जहां देश पर मर मिटने वाले शहीद भगत सिंह ने अंग्रेजों से छिपने के लिए ठिकाना बनाया था. यहीं नहीं ये वही अवध है जिसकी बहू ने देशप्रेम में मर्यादा को भी ताक पर रख दिया था. यह महान महिला कोई और नहीं बल्कि दुर्गा भाभी थीं. भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त जब केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने जाने लगे तो दुर्गा भाभी व सुशीला मोहन ने अपने रक्त से दोनों लोगों को तिलक लगाकर विदा किया था.

कौन थीं दुर्गा भाभी

दुर्गा भाभी का जन्म सात अक्टूबर, क्90ख् को शहजादपुर ग्राम में पंडित बांके बिहारी के यहां हुआ था. इनके पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाजिर थे और इनके बाबा महेश प्रसाद भट्ट जालौन जिला में थानेदार के पद पर तैनात थे. इनके दादा पं. शिवशंकर शहजादपुर में जमींदार थे. दस वर्ष की अल्पायु में ही इनका विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हुआ. इनके ससुर शिवचरण रेलवे में हायर पोस्ट पर तैनात थे. अंग्रेज सरकार ने उन्हें राय साहब का खिताब दिया था. भगवती चरण बोहरा राय साहब का पुत्र होने के बावजूद अंग्रेजों की दासता से देश को मुक्त कराना चाहते थे. वे क्रांतिकारी संगठन के प्रचार सचिव थे. वर्ष क्9ख्0 में पिता की मृत्यु के बाद भगवती चरण वोहरा खुलकर क्रांति में आ गए और उनकी पत्नी दुर्गा भाभी ने भी पूर्ण रूप से सहयोग किया.

क्रांतिकारियों को दी थी पूंजी

दुर्गा भाभी का मायका व ससुराल दोनों पक्ष संपन्न था. ससुर शिवचरण जी ने दुर्गा भाभी को ब्0 हजार व पिता बांके बिहारी ने पांच हजार रुपये संकट के दिनों में काम आने के लिए दिए थे लेकिन इस दंपती ने इन पैसों का उपयोग क्रांतिकारियों के साथ मिलकर देश को आजाद कराने में उपयोग किया. मार्च क्9ख्म् में भगवती चरण वोहरा व भगत सिंह ने संयुक्त रूप से नौजवान भारत सभा का प्रारूप तैयार किया और रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर इसकी स्थापना की. सैकड़ों नौजवानों ने देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों का बलिदान वेदी पर चढ़ाने की शपथ ली. भगत सिंह व भगवती चरण वोहरा सहित सदस्यों ने अपने रक्त से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किए. ख्8 मई क्9फ्0 को रावी नदी के तट पर साथियों के साथ बम बनाने के बाद परीक्षण करते समय वोहरा जी शहीद हो गए. उनके शहीद होने के बावजूद दुर्गा भाभी साथी क्रांतिकारियों के साथ सक्रिय रहीं.

क्रांति की राह पर चल पड़ी थी

9 अक्टूबर, क्9फ्0 को दुर्गा भाभी ने गवर्नर हैली पर गोली चला दी थी जिसमें गवर्नर हैली तो बच गया लेकिन सैनिक अधिकारी टेलर घायल हो गया. मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने गोली मारी थी जिसके परिणाम स्वरूप अंग्रेज पुलिस इनके पीछे पड़ गई. मुंबई के एक फ्लैट से दुर्गा भाभी व साथी यशपाल को गिरफ्तार कर लिया गया. दुर्गा भाभी का काम साथी क्त्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तौल लाना व ले जाना था. चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तौल से खुद को गोली मारी थी उसे दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दी थी. उस समय भी दुर्गा भाभी उनके साथ ही थीं. उन्होंने पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग लाहौर व कानपुर में ली थी.

रखी पाठशाला की नींव

साथी क्रांतिकारियों के शहीद हो जाने के बाद दुर्गा भाभी एकदम अकेली पड़ गई. वह अपने पांच वर्षीय पुत्र सचींद्र को शिक्षा दिलाने की व्यवस्था करने के उद्देश्य से वह साहस कर दिल्ली चली गई. जहां पर पुलिस उन्हें बराबर परेशान करती रहीं. दुर्गा भाभी उसके बाद दिल्ली से लाहौर चली गई, जहां पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तीन वर्ष तक नजरबंद रखा. फरारी, गिरफ्तारी व रिहाई का यह सिलसिला क्9फ्क् से क्9फ्भ् तक चलता रहा. अंत में लाहौर से जिलाबदर किए जाने के बाद क्9फ्भ् में गाजियाबाद में प्यारेलाल कन्या विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी करने लगी और कुछ समय बाद पुन: दिल्ली चली गई और कांग्रेस में काम करने लगीं. कांग्रेस का जीवन रास न आने के कारण उन्होंने क्9फ्7 में छोड़ दिया. क्9फ्9 में इन्होंने मद्रास जाकर मारिया मांटेसरी से मांटेसरी पद्धति का प्रशिक्षण लिया तथा क्9ब्0 में लखनऊ में कैंट रोड के (नजीराबाद) एक निजी मकान में सिर्फ पांच च्च्चों के साथ मांटेसरी विद्यालय खोला. आज भी यह विद्यालय लखनऊ में मांटेसरी इंटर कालेज के नाम से जाना जाता है. क्ब् अक्टूबर क्999 को गाजियाबाद में उन्होंने सबसे नाता तोड़ते हुए इस दुनिया से अलविदा कर लिया.