डॉ बंका को है ड्राइविंग का शौक

दांतों की चमक लौटाने और उनकी बीमारियां ठीक करने में जितना इंटरेस्ट डॉ कुणाल बंका को है, उतना ही लांग ड्राइव करने का शौक भी है। डॉ कुणाल बंका बताते हैं कि जब भी उन्हें मौका मिलता है, वे अपनी फोर्ड फिगो कार के साथ लांग ड्राइव पर निकल जाते हैं.  डॉ कुणाल बंका ने बताया कि उन्हें रेनी सीजन में रामगढ़ रोड में ड्राइव करना बहुत भाता है। लांग ड्राइव पर उनकी स्पीड 80-90 के बीच रहती है। ड्राइव पर उनके साथ उनकी फैमिली रहती है और उस समय का मजा कुछ और होता है।

ऑयल पेंटिंग है पसंद
महीने के तीसों दिन मरीजों की सेवा में लगी रहनेवाली डॉ सरोज राय जितनी सादगी से रहती हैं, उतनी ही मेहनत से वे मरीजों की सेवा करती है। डॉॅ सरोज राय ने बताया कि खाली समय में इन्हें ऑयल पेंटिंग बनाने का शौक है। इसमें उन्हें काफी सुकून मिलता है। जब भी खाली समय मिलता है, वह अपने इस शौक को जरूर पूरा करती हैं।

मुझे है खेल का जुनून
रिम्स के मेडिसीन डिपार्टमेंट में जितनी विनम्रता से डॉ संजय कुमार सिंह मरीजों को देखते हैं, उतनी ही रुचि उन्हें खेलने में भी है। डॉ सिंह ने बताया कि जब वह रिम्स में 1979 से 84 के बीच पढ़ाई कर रहे थे, तो उस दौरान उन्होंने बैडमिंटन और फुटबॉल में अपनी क्लास को रिप्रेजेंट किया। खेलों के प्रति उनका जुनून अब भी कम नहीं हुआ है। आज भी शाम छह से सात बजे के बीच वह खेलने में जुट जाते हैं।

हर्बल पौधों पर रिसर्च का शौक  
लालपुर में रहनेवाले डॉ एसके अग्रवाल पेशे से तो एलोपैथिक सर्जन हैं, लेकिन हर्बल पौधों के बचपन से शौक ने इन्हें रिसर्च की ओर जोड़ लिया। नतीजा यह निकला कि अपने घर की चार कट्ठे की जमीन पर इन्होंने हर्बल पौधे उगाने शुरू            कर दिए और उन पर रिसर्च करने लगे। इनके बगीचे में थाईलैंड का अमरुद है तो इंग्लैंड की तुलसी।

इन्हें है सिक्कों का शौक
डॉ पांडेय रविभूषण एमजीएम मेडिकल कॉलेज जमशेदपुर में प्रोफेसर हैं। मरीजों के ट्रीटमेंट का उन्हें जितना शौक है, उतना ही शौक इन्हें दुर्लभ सिक्कों, नोट और स्टांप का है। संग्रह में सोने-चांदी के सिक्कों और ब्रिटिश पीरियड के नोटों को देखकर लोग आश्चर्य करते हैं।

डिजायर की सवारी मुझे है प्यारी
जिस तेजी से अपने मरीज का मर्ज डॉ दीपक सिंह पढ़ लेते हैं, लगभग उतनी तेजी से ही कार ड्राइव करना भी उनका फेवरिट शौक है। डॉ दीपक सिंह ने बताया कि सीआईपी में सीनियर रेजिडेंट रहते ही  कार ड्राइविंग का बेहद शौक था, लेकिन उस समय ड्राइविंग का बहुत मौका नहीं मिल पाता था। अब वह सीसीएल नयासराय हॉस्पिटल गांधीनगर में काम करते हैं। रांची से रामगढ़ तक की 80 किमी की दूसरी वह रोज ड्राइव करके पूरी करते हैं।

नहीं लेते हैं गरीब से फीस
नाम- डॉ अबू रेहान
डिग्री- बीएससी ऑनर्स, एमबीबीएस, एमडी पेडियाट्रिक
फीस- 300 रुपए, पर गरीबों के लिए फ्री
बरियातू में रहते हैं चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ अबू रेहान। बच्चों के डॉक्टर हैं और गरीब पेशेंट्स के लिए भगवान। हर दिन केवल दस मरीजों को देखते हैं और गरीब मरीजों को फ्री देखते हैं। अगर किसी गरीब मरीज के पास पैसे नहीं हों, तो अपनी जेब से उसे दवाओं के लिए पैसे भी दे देते हैं। रिम्स के पेडियाट्रिक डिपार्टमेंट से बतौर एसोसिएट प्रोफेसर रिटायर्ड डॉ अबू रेहान बताते हैं कि जो अमीर हैं और इलाज का खर्च वहन कर सकते हैसं उनसे पैसा लेना जायज है पर जो गरीब हैं उनका तो फ्री इलाज करना ही होगा।
जिनके खाने का ठिकाना नहीं है वो भला पैसे कहां से देंगे। अब अगर ऐसे मरीजों का इलाज न किया जाए तो उनका क्या होगा। ऐसे मरीजों की मदद और इलाज मेरा धर्म है और जहां तक संभव हो मैं इसे निभाने की कोशिश कर रहा हूं।

हीमोफिलिया पेशेंट के लिए वरदान
नाम- डॉक्टर एचपी नारायण
डिग्री- एमबीबीएस, एमएस, एफआरसीएस
फीस- 100 रुपए
ये हैं डॉक्टर एचपी नारायण। ये मात्र 100 रुपए में मरीजों को देखते हैं। रिम्स के 1958 बैच के स्टूडेंट रह चुके डॉ एचपी नारायण रिम्स के डिपार्टमेंट ऑफ न्यूरोसर्जरी के हेड के पोस्ट से रिटायर हुए हैं। हीमोफीलिया के मरीजों की मदद करने में इनका कोई जवाब नहीं। जहां तक संभव हो, गरीब मरीजों की मदद से भी ये नहीं हिचकते। हीमोफिलिया पेशेंट्स के लिए तो ये किसी वरदान के समान ही है। हीमोफीलिया के पेशेंट्स से डॉ एचपी नारायण फीस नहीं लेते। उनकी सर्जरी भी ये मुफ्त ही करते हैं।
बकौल डॉ एचपी नारायण उन्होंने एक ऐसे बच्चे का सेवा सदन में ऑपरेशन किया जिसके पास दवा और सर्जरी की तो छोडि़ए खाने के भी पैसे नहीं थे। ऐसे लोगों से पैसा मैं क्या लेता। उसकी दवाओं में करीब 25 हजार का खर्च आया। उसकी हालत देखते हुए मुझे अपने डॉक्टर मित्रों से पैसे की मदद मांगनी पड़ी। बंबई के डॉ घोष जो हीमोफिलिया सोसायटी से जुड़े हुए हैं उन्होंने इसमें काफी मदद की। पर जब उस मरीज की जान बच गई तो मुझे बेहद आत्मसंतोष हुआ।

आज भी पांच रुपए में इलाज
नाम- डॉ एसपी मुखर्जी
डिग्री- एमबीबीएस, एमडी
फीस- 5 रुपए
सरकुलर रोड में डॉ एसपी मुखर्जी का क्लीनिक आज भी गरीब मरीजों के लिए वरदान की तरह है। यहां पिछले 50 सालों से भी अधिक समय से डॉ एसपी मुखर्जी महज पांच रुपए में मरीजों को देखते हैं। काफी कम फीस होने के कारण इनके कलीनिक में मरीजों की भीड़ लगी रहती है। इनकी सेवा भावना को देखते हुए इन्हें कई संस्थाओं ने सम्मानित किया है। इनके डेडिकेशन पर डॉक्यूमेंटरी फिल्म भी बन चुकी है।