कोरोना काल में जब सभी लोग संक्रमण के खतरे की वजह से अपने-अपने घरों में बंद थे. उस दौरान कुछ लोग अपना परिवार छोड़ आम लोगों की सेवा में जुटे थे. कोविड टेस्ट सर्टिफिकेट वेरीफाई डाटा एंट्री जैसे कार्यों में युवकों को लगाया गया था. उस वक्त इन कर्मियों को कोरोना सैनिक के नाम से पुकारा जा रहा था. लेकिन अब इन्हें अपने मेहनताने के लिए ही भटकना पड़ रहा है.


रांची (ब्यूरो)। बीते साल फरवरी और जून महीने में कोविड-19 से जुड़े कामों के लिए कुछ युवकों की नियुक्ति की गई थी। शुरू के कुछ महीने इन युवाओं को भुगतान किया गया, लेकिन फिर वेतन में टाल-मटोल किया जाने लगा। कोरे आश्वासन पर युवा काम करते रहे। लेकिन अब तक भुगतान नहीं होने के कारण इन युवाओं के सब्र का बांध टूट पड़ा और सभी युवाओं ने वेतन के लिए सिविल सर्जन ऑफिस का घेराव कर दिया। 244 युवाओं की हुई थी नियुक्ति


कोरोना काल में कर्मचारियों की कमी को देखते हुए सदर हॉस्पिटल में 244 युवाओं को वीएलई पद पर नियुक्ति दी गई थी। इनमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल हैं। कुछ लड़के-लड़कियों को प्रति दिन पांच सौ रुपए और कुछ को चार सौ रुपए प्रतिदिन के मानदेय पर नियुक्त किया गया था। वेतन मांगने पहुंचे युवाओं ने बताया कि इनकी नियुक्ति किसी प्राइवेट एजेंसी के द्वारा नहीं हुई थी। जिला प्रशासन की ओर से सीधे तौर पर विज्ञापन निकाला गया था। जिस आधार पर इंटरव्यू लेकर नियुक्त कर लिया गया था। नियुक्ति के बाद किसी को दो तो किसी को तीन दिन ट्रेनिंग भी दी गई थी। अब काम खत्म होने के बाद विभाग वेतन देने से मुकर रहा है। कुछ लड़कों का तीन महीने तो कुछ का पांच महीने का वेतन बकाया है। हर बार प्रबंधन कुछ न कुछ बहाना बनाकर सभी को वापस भेज देता है। युवाओं ने बताई परेशानीकोरोना काल में जब परिवार वाले मना कर रहे थे, उस दौरान हम लोग आम पब्लिक की सेवा में जुटे रहे। आरटीपीसीआर टेस्ट हो या एंटीजन टेस्ट सभी में हम लोगों ने ईमानदारीपूर्वक योगदान दिया। अब हम लोगों को ही वेतन के लिए दौड़ाया जा रहा है। - रौशन नायक मैंने कोरोना काल में नौ महीने काम किया। छह महीने का पैसा मिला। तीन महीने का अब भी बकाया है। जो वेतन मिला वह भी रोक-रोक कर दिया गया। मेरा काम टेस्टिंग और डाटा एंट्री से जुड़ा था। - दीपक कच्छप मात्र 12 हजार रुपए की सैलरी पर नौकरी दी गई थी। वह भी तीन महीने का नहीं दिया गया है। जब भी मांगने आते हैं, फंड को रोना रोकर वापस भेज दिया जाता है। कोरोना काल में खतरे से खेल कर हमलोगों ने ड्यूटी की, हमारे साथ ही अन्याय किया जा रहा है। - खुशबू लकड़ा

ड्यूटी के बाद घर जाते थे तो सबसे पहले कपडे, जूते उतार कर नहाना पडता था। किसी समीप जाने से पहले खुद को अ'छी तरह सेनेटाइज कर के जाते थे। हमेशा संक्रमण का डर बना रहता था। प्रबंधन सारी बाते भुला गया। - फोलिना बिहां

Posted By: Inextlive