पेड़ न होते तो टल सकता था हादसा

2018-04-27T07:00:30Z

ड्राइवर की आंखों देखी

- कुशीनगर के दुधई में हुए रेल हादसे के बाद लोको पायलट्स व गार्ड ने बताया आंखों देखा मंजर

- ट्रेन लेकर गोरखपुर पहुंचने के बाद लोको पायलट व गार्ड की हुई मेडिकल जांच

GORAKHPUR: कुशीनगर के दुधई में हुए रेल हादसे के बाद जहां हर कोई बच्चों की मौत के गम में डूबा रहा। वहीं, ट्रेन के लोको पायलट व गार्ड भी हादसे के बाद बदहवास हो गए। जिस सिवान-गोरखपुर पैसेंजर ट्रेन से गुरुवार सुबह यह हादसा हुआ, उसके लोको पायलट विजय शंकर यादव, असिस्टेंट लोको पायलट आनंद प्रकाश के मुताबिक दोनों करीब 12 वर्षो से ट्रेन चला रहे हैं, लेकिन उनकी अब तक की सर्विस में कभी इतना बड़ा कोई हादसा नहीं हुआ। इस तरह के पहले हादसे के बाद दोपहर करीब 12 बजे ट्रेन लेकर गोरखपुर पहुंचे लोको पॉयलट व गार्ड की विभागीय जांच भी शुरू हो गई। स्टेशन प्रबंधक की मौजूदगी में लोको पायलट, असिस्टेंट लोको पायलट व गार्ड का मेडिकल कराया गया। तीनों कर्मचारियों का डॉक्टर्स की टीम ने जहां ब्लड सैंपल लिया, वहीं ब्रेथ एनालाइजर के जरिए उनके शरीर में अलकोहल भी जांची गई। ताकि यह पता चल सके कि हादसे के वक्त कहीं ड्राइवर व गार्ड शराब के नशे में तो नहीं थे।

30 मीटर की दूरी पर दिखी वैन

लोको पायलट को सिर्फ इस बात का अफसोस रहा कि काश रूट पर लाइनों के किनारे इतने पेड़ न होते तो यह हादसा टल सकता था। इस दिल दहलाने वाले हादसे के सबसे बड़े प्रत्यक्षदर्शी लोको पायलट के मुताबिक सुबह करीब सात बज रहे थे। पैसेंजर ट्रेन अभी काशन संख्या 7- पर पहुंची थी। लोको पायलट के मुताबिक इस काशन पर निर्धारित स्पीड तो 100 किमी प्रति घंटे की है, लेकिन चूंकि जल्द ही दुधई रेलवे स्टेशन आने वाला था, ऐसे में उस वक्त गाड़ी की स्पीड करीब 75 किमी प्रति घंटे की ही थी। घटना स्थल वाली जगह पर रेल ट्रैक भी सीधा नहीं था और लाइन के दोनों किनारों पर घने पेड़ थे। ऐसे में अनमैंड क्रॉसिंग पर खड़ी गाड़ी पर जब तक लोको पायलट की नजर पड़ी तब तक ट्रेन बेहद करीब आ चुकी थी। हॉर्न देने के सिवाय लोको पायलट के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था। लोको पायलट व गार्ड के मुताबिक ट्रेन व गाड़ी की दूरी महज 30-40 मीटर ही रही होगी। ऐसे में इमरजेंसी ब्रेक लगाकर भी ट्रेन रोक पाना संभव नहीं था। हालांकि लोको पायलट ने लगातार हॉर्न देकर खतरा जताया और हॉर्न की अवाज सुन वहां मौजूद गेट मित्र ने भी वैन के ड्राइवर को सचेत किया। बावजूद इसके हादसा नहीं टल सका।

180 मीटर होती दूरी तो रुक जाती ट्रेन

ट्रेन के लोको पायलट के मुताबिक अनमैंड क्रॉसिंग पर खड़ी वैन पर जब उनकी नजर पड़ी तो उसकी दूरी महज 30-40 मीटर ही थी। ऐसे में ट्रेन को रोक पाना संभव नहीं था। उन्होंने बताया कि अगर 170-180 मीटर की दूरी पर भी वैन दिख गई होती तो इमजेंसी ब्रेक लगाकर ट्रेन रोकी जा सकती थी। ट्रेन के दोन ों ड्राइवर्स को इस बात का बेहद अफसोस रहा। यह बताते हुए दोनों की आंखें भी भर आईं। उनका कहना था कि हमारे घरों में भी छोटे बच्चे हैं। सिर्फ यह सोचकर हम खुद को माफ नहीं कर पाएंगे कि काश हम उन मासूमों की जान बचा पाते।

12 घंटे ली थी रेस्ट

लोको पायलट विजय शंकर यादव व गार्ड दिलीप यादव के मुताबिक वह लोग बुधवार शाम करीब ढाई बजे ट्रेन लेकर सिवान पहुंचे थे। इसके बाद तीन बजे से रेस्ट पर चले गए। करीब 12 घंटे की भरपूर रेस्ट लेने के बाद दोबारा गुरुवार भोर में करीब तीन बजे रेलवे स्टेशन पहुंचे और सुबह 4.23 बजे सिवान-गोरखपुर पैसेंजर ट्रेन लेकर गोरखपुर के लिए रवाना हुए। उनका कहना था कि उन्हें क्या पता था कि यह सफल काल का सफर होगा और उनकी ट्रेन से एक साथ इतने मासूम मौत की नींद सो जाएंगे। यह बताते हुए गुरुवार को गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर स्थित डीजल लॉबी में तीनों कर्मचारियों की आंखें भर आई। उन्होंने बताया कि हादसे के तत्काल बाद इमरजेंसी ब्रेक लगाकर ट्रेन रोकी गई और इसकी सूचना कंट्रोल को दी गई। सूचना पाकर सभी अधिकारी मौके पर पहुंच गए।

चीख पुकार से कांप गए कर्मचारी

हादसे के बाद चारों तरफ बिखरी पड़ी मासूमों की लाशें और चीख पुकार देख ट्रेन के ड्राइवर व गार्ड बदहवास हो गए। गलती भले ही उनकी न रही हो, लेकिन कहीं न कहीं वह इसके लिए खुद को ही जिम्मेदार मानते हुए कांप उठे। सभी की आंखों में सिर्फ इस बात का अफसोस रहा कि काश किसी भी तरह से समय रुक जाता और हादसे को बचाया जा सकता।


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