Vashishtha Narayan Singh Death राजकीय सम्मान के साथ पैतृक गांव में अंतिम संस्कार

2019-11-15T11:02:32Z

बिहार की विभूति और प्रख्यात गणितज्ञ डॉ। वशिष्ठ नारायण सिंह जिसने गणित के क्षेत्र में दुनिया भर में बिहार का नाम रोशन किया आखिरकार चले गए। महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के फार्मूले को चुनौती देने वाले वशिष्ठ बाबू का गुरुवार को निधन हो गया। वे 74 वर्ष के थे और सिजोफ्रेनिया से पीड़ित थे।

पटना (ब्यूरो)। गुरुवार की सुबह खून की उल्टियां होने पर परिजन उन्हें लेकर पीएमसीएच पहुंचे मगर डॉक्टरों ने वहां उन्हें मृत घोषित कर दिया। इसके बाद परिजन उन्हें वापस घर ले जाने के लिए शव वाहन का इंतजार करते रहे मगर अस्पताल की ओर से कोई वाहन मुहैया नहीं कराया गया। बाद में जब टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर इसकी खबर फैली तो उच्च अधिकारियों की पहल पर एंबुलेंस मुहैया कराई गई। इसके बाद उनका शव कुल्हडि़या कॉम्पलेक्स स्थित उनके अपार्टमेंट लाया गया। यहां से दोपहर बाद परिजन उनका पार्थिव शरीर लेकर भोजपुर स्थित पैतृक गांव बसंतपुर ले गए। शुक्रवार को पैतृक गांव में ही उनका अंतिम संस्कार होगा।
आज होगा अंतिम संस्कार

वशिष्ठ बाबू के निधन की सूचना मिलते ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद कुल्हडि़या कॉम्प्लेक्स स्थित उनके आवास पर पहुंचकर भावभीनी श्रद्धांजलि दी। बिहार सरकार ने राजकीय सम्मानपूर्वक उनकी अंत्येष्टि करने की घोषणा की है। उनके पार्थिव शरीर को राजकीय सम्मान के साथ उनके गांव आरा जिले के बसंतपुर भेज दिया गया जहां शुक्रवार को उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। महान गणितज्ञ के निधन पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राज्यपाल फागू चौहान समेत कई हस्तियों ने शोक जताया है।
गुमनामी में कट गया जीवन
प्रख्यात गणितज्ञ के जीवन का आधा से ज्यादा हिस्सा गुमनामी में ही गुजर गया। जिस शख्स के लिए कभी पटना यूनिवर्सिटी ने नियमों को तोड़ा, कभी बर्कले यूनिवर्सिटी ने अपना हिस्सा बनाकर खुद को सम्मानित महसूस किया तो कभी नासा ने अपने साथ जोड़कर गौरवान्वित महसूस किया, वह अपने देश में गुमनामी के अंधेरे में ही खोया रहा। जीते जी न तो देश के लेवल पर किसी ने उन्हें सम्मानित करने की जहमत उठाई न उनके गृह प्रदेश बिहार ने उन्हें कोई पहचान दी। वो 1972 में हमेशा के लिए भारत आ गए और आईआईटी कानपुर के लेक्चरर बने। 5 वर्षो के बाद वो अचानक सिजोफ्रेनिया बीमारी से ग्रसित हो गए। इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन बेहतर इलाज नहीं होने के कारण वो वहां से भाग गए। 1992 में उन्हें सीवान में एक पेड़ के नीचे बैठे देखा गया। सब कुछ भूलने के बाद भी गणित से उनका लगाव दिखता था। हमेशा डायरी पर लिखते। डायरी भर जाती तो दीवारों पर लकीरें खींचने लगते। इससे मन भर जाता तो बांसुरी बजाने लगते।
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Posted By: Inextlive Desk

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