आरोग्य निधि फंड के इस्तेमाल के लिए गरीब ही नहीं मिले स्वास्थ्य विभाग को

50

लाख रुपए आए थे गरीबों के फ्री इलाज के लिए

10

मरीज ही मिले तीन साल में गरीब

44

लाख रुपए लौटा दिए गए शासन को

तीन साल में दस मरीजों पर छह लाख रुपए ही खर्च कर सका मेडिकल कॉलेज

सामने आई तत्कालीन SIC और FO की लापरवाही, बैठी जांच

ALLAHABAD: अजीबो गरीब है लेकिन कागजों का सच तो यही है। गरीबों के इलाज के लिए स्मार्ट कार्ड बना और तीस हजार रुपए का इलाज फ्री में करने का अधिकार दे दिया गया तो गरीबों की बाढ़ आ गई। नतीजा इस योजना की वॉट लग गई और सरकार को इसे बंद कर देना पड़ा। एक दूसरा सच यह है कि 50 लाख रुपए आए गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों के इलाज के लिए। तीन साल तक खाते में पैसा पड़ा रहा। इसके बाद भी गरीब मरीज ही नहीं मिले। इस दरम्यान कुल दस मरीजों का इस पैसे से इलाज हुआ और छह लाख रुपए ही खर्च किए गए। बाकी 44 लाख रुपए ब्याज के साथ वापस लौटा दिए गए। हो सकता है इस दोनों तथ्यों में बड़े फर्क के पीछे ईमानदारी और बेइमानी का खेल हो। लेकिन, सवाल तो दोनों की स्थितियों पर खड़ा होता है, और यहां भी खड़ा हो गया है। मेडिकल कॉलेज के तत्कालीन एसआईसी और फाइनेंस ऑफिसर सवालों में घेरे में हैं। जांच बैठा दी गई है। रिपोर्ट आने पर ही पूरा सच सामने आएगा।

क्या है पूरा मामला

वर्ष 2009 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने गरीबों के इलाज के लिए आरोग्य निधि का गठन किया। इस निधि से इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज को पचास लाख रुपए मिले। इस पैसे का इस्तेमाल गंभीर रूप से बीमार गरीबों के इलाज और ऑपरेशन में होना था। दवा बाहर से मंगाकर देनी पड़े या फ्री में सर्जरी करानी पड़े, पैसा इस मद से दिया जा सकता था। यह पैसा वर्ष 2012 तक मेडिकल कॉलेज के सेविंग एकाउंट में पड़ा रहा। इस दौरान इसमें से कुल छह लाख रुपए निकाले गए। बाकी 44 लाख रुपए शासन को वापस कर दिए गए। चार सालों तक फाइलों में दबा रहा यह मामला अब सुर्खियों में आ गया है। जिलाधिकारी ने खुद इसे नोटिस ले लिया और क्वैरी शुरू कर दी। डीएम संजय कुमार ने इस मामले में मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने आरोग्य निधि फंड के उपयोग की पूरी जानकारी तलब की है। साथ ही अब तक इस फंड में जारी हुए कुल पैसे और उसके उपयोग की जांच के लिए भी प्रशासन ने निर्देश जारी कर दिए हैं।

जिम्मेदार अफसरों ने खींचे कदम

इस मामले में मेडिकल कॉलेज प्रशासन का कहना है कि तत्काल एसआईसी और फाइनेंस कंट्रोलर के पास आरोग्य निधि फंड को रखने और खर्च करने का अधिकार होता था। छह लाख रुपए से दस मरीजों को इलाज व सर्जरी के जरिए लाभांवित किया गया था। यह भी बता दें कि इस निधि के फंड से इलाज कराने के लिए मरीज का बीपीएल कार्डधारी होना जरूरी होता है। डॉक्टर द्वारा मरीज की अप्लीकेशन फारवर्ड किए जाने पर पहले डीएम और फिर कमिश्नर अपनी सहमति जारी करते हैं। लेकिन, तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों ने 44 लाख रुपए के उपयोग को लेकर सिरदर्द न लेने में ही भलाई समझी, जिससे गरीबों को उनका हक नही मिल सका।

प्रशासन के निर्देश पर मेडिकल कॉलेज प्रशासन से आरोग्य निधि फंड के उपयोग का ब्यौरा मांगा गया है। रिपोर्ट आने के बाद इसे प्रशासनिक अधिकारियों को उपलब्ध करा दिया जाएगा।

डॉ। आलोक वर्मा, सीएमओ

2009 में केवल एक बार आरोग्य निधि का पैसा आया था। इसके उपयोग का अधिकारी एसआईसी और फाइनेंस कंट्रोलर के पास होता है। जो जानकारी मांगी गई है, उसे उपलब्ध करा दिया गया है।

प्रो। एसपी सिंह,

प्रिंसिपल, मेडिकल कॉलेज

कैसे होता था इस पैसे का उपयोग

आयोग्य निधि फंड में पैसा मेडिकल कॉलेज को मिला था

इस पैसे का कहां और कितना इस्तेमाल करना है, इसे फाइसेंस कंट्रोलर और एसआईसी मिलकर तय करते थे

इस पैसे से सिर्फ उन गरीबों का इलाज हो सकता था जिनके पास बीपीएल कार्ड हो

डॉक्टर द्वारा मरीज की अप्लीकेशन फारवर्ड की जाती थी जिसमें उसकी बीमारी का जिक्र होता था

यह लेटर पहले डीएम और फिर कमिश्नर के पास पहुंचता था। दोनों के ओके करने के बाद भी पैसा खर्च हो सकता था

शायद इतने लफड़े से बचने के लिए अफसरों ने सिरदर्द मोल न लेने में भलाई समझी