गोरखपुर (ब्यूरो)।लोगों में जागरुकता का अभाव है, इसलिए लोग तेजी से संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं। डॉक्टर्स की मानें तो सोसायटी में इस बीमारी को छोटी माता के नाम से जाना जाता है। आमतौर पर लोग इसमें इलाज के बचते हैं और झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं। जबकि, डॉक्टर्स का कहना है कि सावधानी बरतने के साथ इलाज भी जरूरी है। वरना सेकेंडरी इंफेक्शन की संभावना बनी रहती है।

पिपरसंडी में है वायरस का प्रकोप

गोरखपुर जिले के बेलघाट एरिया में चिकन पॉक्स का प्रकोप फैला हुआ है। यह वायरस पिपरसंडी में फैला हुआ है। इसकी चपेट में आने से दर्जन भर लोग बीमारी हो चुके हैंं। बीमार हुए लोगों की सूचना पर हेल्थ डिपार्टमेंट हरकत में आ गया है। आनन-फानन में सीएमओ ने डॉक्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ की टीम गांव में भेज दी है। टीम ने बीमार हुए छह लोगों के ब्लड सैंपल लिए हैं। इन्हें जांच के लिए आरएमआरसी सेंटर भेजा जा रहा है। यहां फरवरी से ही वायरस फैल रहा है। हालांकि इसी बीच एक-दो ही लोग बीमार होकर सामने आ रहे थे। इसकी चपेट में गांव का दक्षिण टोला सबसे अधिक प्रभावित रहा। बीते एक हफ्ते से अचानक वायरस के मामले बढऩे लगे। लोगों को तेज बुखार के साथ शरीर पर दाने निकलने लगे। कुछ मरीजों को उल्टी-दस्त की प्रॉब्लम भी हुई। शुरूआत में लोगों ने झाड़-फूक कराई हालांकि कोई फायदा नहीं हुआ।

पिछले छह महीने से गांव में वायरस का प्रकोप

पिछले एक हफ्ते से गांव में बीमारी का प्रकोप बढ़ गया। गांव के बालकिशन (14), पूनम (30), सुमन (23), सत्यम (13), कनक (10), तनु (7), वंदना (5), आयुष (3), रत्ना (32), बबलू (35) और मंजू (18) की तबीयत खराब हो गई। सभी को तेज बुखार के साथ शरीर पर दाने निकले हैं। कुछ मरीजों के शरीर पर दाने लाल होकर फफोले पड़ गए हैं। जिससे पानी निकल रहा है। इसकी जानकारी लोगों ने हेल्थ डिपार्टमेंट को दी। डॉक्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ की टाम गांव पहुंच गई है। इस बीच मरीजों के शरीर पर दानों के आकार सामान्य चिकन पॉक्स के मानक से कुछ बड़े मिले। हालांकि उनका ब्लड सैंपल लेकर जांच के लिए भेज दिया गया है।

चिकन पॉक्स के लक्षण

- शुरुआत से पहले पैरों और पीठ में पीड़ा और शरीर में हल्का बुखार, हल्की खांसी, भूख में कमी, सर में दर्द, थकावट, उल्टियां आदि का आभास होता है।

- 24 घंटों के अंदर पेट या पीठ और चेहरे पर लाल खुजलीदार फुंसियां उभरने लगती हैं, जो बाद में पूरे शरीर में फैल जाती है।

- सिर, मुंह नाक, कानों और गुप्तांगों पर यह फुंसियां दानों और किसी कीड़े के डंग की तरह लगती हैं, पर धीरे-धीरे यह तरल पदार्थ युक्त पतली झिल्ली वाले फफोलों में परिवर्तित हो जाती है।

-चिकन पॉक्स के फफोले एक इंच चौड़े होते हैं और उनका तल लाल किस्म के रंग का होता है और 2 से 4 दिनों में पूरे शरीर में तेजी से फैल जाते हैं।

बीमारी का कारण

-चिकन पॉक्स, वेरीसेल्ला जोस्टर वायरस से फैलने वाली एक संक्रामक बीमारी है।

- इसके वायरस संक्रमित व्यक्ति के थूक, खांसी और छींक से बाहर निकलकर दूसरे व्यक्ति तक सांस लेने से पहुंच जाते हैं।

-व्यक्ति को एक बार होने के बाद यह दोबारा उसे नहीं होती

-चिकन पॉक्स होने पर बच्चों को एस्प्रिन लेने पर रेईस सिन्ड्रोम जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है।

-एचआईवी ग्रसित या प्रतिरोधी प्रणाली में कमी वाले मरीजों को निमोनिया का अधिकतर खतरा होता है।

-जिन गर्भवती महिलाओं को कभी चिकन पॉक्स नहीं हुआ है उन्हें इस बीमारी से संक्रमित व्यक्ति के करीब नहीं जाना चाहिए।

बीमारी से बचाव

-बीमारी के निवारण के लिए 12 से 15 महीनों की उम्र के बीच बच्चों को चिकन पॉक्स का टीका और 4 से 6 वर्ष की उम्र के बीच बूस्टर टीका जरूर लगवाना चाहिए।

-यह टीका चिकन पॉक्स के हल्के संक्रमण की रोकथाम में 80 परसेंट तक असरकारक होता है।

-गंभीर किस्म के संक्रमण को रोकने में यह टीका 75 परसेंट तक असरदार होता है।

यह है देसी उपचार

-दानों में होने वाली खुजली से बचने के लिए 2 लीटर पानी में 2 कप जई का आटा मिलाकर लगभग 15 मिनट तक उबालें, पके आटे को एक कॉटन के बैग में अच्छी तरह से बांधकर बॉथ टब में डालकर बच्चे को नहलाएं।

-आधा कप भरे सिरके को पानी में डालकर नहाने से शरीर में हो रही खुजली से निजाप पाई जा सकती है।

-नींबू का रस, सब्जी और अन्य फलों का जूस भी चिकन पॉक्स में राहत देता है।

-नीम की पत्तियों को गर्म पानी में डालकर नहाने से खुजली समाप्त होती है।

- विटामिन-ई युक्त तेल को शरीर पर लगाइए, राहत मिलेगी।

- चिकन पॉक्स में गाजर बहुत लाभकारी होता है। उबले गाजर और धनियां को खाने से चिकन पॉक्स से आई कमजोरी को कम किया जा सकता है।

संक्रमण होने की वजह से चिकन पॉक्स पहले तेजी से फैलती थी, इसलिए लोग इसे देवी प्रकोप मानते थे। अब इसके वायरस की खोज हो चुकी है और 72 घंटों के भीतर इलाज शुरू करने से संक्रमण और लक्षणों के फैलने पर भी रोक लगती है। इसलिए शुरूआती लक्षणों की पहचान के बाद डॉक्टरी सलाह जरूर लेनी चाहिए।

- डॉ। नवीन वर्मा, स्कीन रोग विशेषज्ञ जिला अस्पताल