मेरठ (ब्यूरो)। मातृशक्ति से ही राष्ट्र सुभोषित है। अपनी इच्छाशक्ति और हौसले के बलबूते ही महिलाएं राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं हैं। मेरठ शहर में भी कई ऐसी महिलाएं हैं, जो अपनी काबलियत और प्रतिभा के दम पर प्रेरणापुंज बनी हुई हैं। आज महिला दिवस है। शहर में कुछ ऐसी महिलाएं हैं जिन्होंने अपनी मेहनत के बल पर समाज को नई दिशा दी है। इसके साथ वे दूसरों को रोजगार भी दे रहीं हैं। आइए जानते हैं उन महिलाओं की कहानी उनकी ही जुबानी

दिव्यांगों की हेल्प के लिए समर्पित कर दिया जीवन
मैं ज्योति तालियान हूं। इन दिनों मैं दिव्यांगों के लिए काम कर रही हूं। मैंने श्री महावीर शिक्षा सदन जैननगर से इंटरमीडिएट किया था। दो फरवरी 2006 को एक प्रोग्राम हुआ था। फाउंडेशन की तरफ से ब्लाइंड बच्चों के लिए डोनेशन कलेक्ट हो रहे थे। मैं भी इस प्रोग्राम में थी। जब मैने दिव्यांगों की हालत देखी तो उनका दर्द समझ में आया। यहीं से मेरी लाइफ स्टाइल बदल गई। मेरे सोचने का तरीका भी बदल गया। अब मैने संकल्प किया कि दिव्यांगों के लिए कुछ करना है। इंटरमीडिएट के बाद मैंने शहीद मंगल पांडे महिला कॉलेज में बीए में एडमिशन लिया। पढ़ाई के दौरान पता चला कि कॉलेज के पास में ही मूकबधिर स्कूल है। मैंने मूकबधिर कॉलेज के टीचर सुनील कनौजिया से मुलाकात की। उनके साथ दिव्यांगों के लिए काम में जुट गई। सुनील सर खुद फिजिकल चैलेंजर हैं। वे दूसरों के लिए काम कर रहे हैं तो मैं क्यों नहीं। मैने भी दिव्यांगों के लिए कार्य करना शुरू कर दिया। कॉलेज और संस्थाओं से डोनेशन लेकर दिव्यांगों की हेल्प करने लगे। मुझे इन लोगों से इतना प्यार हो गया कि मैंने ठान ली अगर दूसरों को प्र्रेरित करना है तो पहले खुद कुछ ऐसा करना होगा जो मिसाल बन जाए। मैनें हरियाणा की टीम से खेलने वाले प्लेयर प्रमोद कुमार से शादी की। मेरे पति भी फिजिकल चैलेंजर हैं। शादी को पांच साल हो गए। हमारा एक बेटा है जो नार्मल है। इससे लोगों का भ्रम भी दूर हो गया कि फिजिकल चैलेंजर के बच्चे नॉर्मल हो जाते हैं। मुझसे प्रेरित होकर नौ और लोगों ने फिजिकल चैलेंजर से ही शादी की।मैने दिव्यांगता के क्षेत्र में योगा का महत्व पर रिसर्च किया। साल 2013 में एमए किया है। वूमेन अवार्ड भी मिल चुका है, अब हम नेशनल लेवल के प्रोग्राम करा रहे हैं। मेरा लक्ष्य है कि देश का हर दिव्यांग कामयाबी के शिखर पर हो।

साउथ अफ्रीका की किलिमंजारो चोटी पर फहराया तिरंगा
कहते हैं हौसले अगर मजबूत हों, तो हसरतें पूरी होती है, मेरा भी कुछ ऐसा ही मानना है। मेरा नाम रितु जांगिड़ है। बचपन से ही मेरा सपना था कि कुछ ऐसा करूं कि देश का नाम पर दुनिया में रोशन हो। बस हौसला था और हिम्मत भी, बस इसी मूलमंत्र के बल पर मैंने साउथ अफ्रीका की किलमंजारो चोटी पर तिरंगा फहराया। मेरी लाइफ में 23 से 26 जनवरी का बहुत महत्व है। क्योंकि इन तीनों में मेरे जीवन की परिभाषा ही बदल गई। जब 18,500 मीटर ऊंची किलमंजारों चोटी पर तिरंगा लहराया तो सच मानिए ऐसा कि आज मेरा जीवन सफल हो गया है। वैसे तो मेरी पढ़ाई लिखाई मेरठ में ही हुई है। मेरठ के शहीद मंगल पांडे महिला कॉलेज से पीजी कंप्लीट किया। साउथ अफ्रीका से मैं बीती 30 जनवरी को वापस भारत लौटी तो नजारा बदला था। अब लोग मुझे पर्वतारोही रितु के नाम से पहचानते हैं। बचपन में मां की मौत हो गई थी, इसलिए जीवन में बहुत संघर्ष किया। साल 2013 में पापा की भी कैंसर से मौत हो गई। मेरे दो भाई है। अब देश के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत है। मैं एक कबड्डी की खिलाड़ी भी हूं। एक स्पोट्र्स पर्सन होने के कारण मेहनत करने से कभी पीछे नहीं रहती हूं।

महिलाओं को दी ट्रेनिंग, अब वो बना रहीं ब्रांडेड ड्रेस
मैं ययाति चौधरी हूं। मेरा घर मवाना रोड स्थित सलारपुर गांव है। अक्सर मैं आसपास देखती थी कि महिलाओं को बिजनेस के क्षेत्र में जाने के लिए कोई प्रेरित नहीं करता था। उनका दायरा कुछ जॉब्स तक ही था, जैसे टीचिंग, बैंक आदि। मैं भी आम लड़कियों की तरह थी, लेकिन मेरे सपने कुछ अलग थे। मैने विद्या नॉलेज पार्क से फैशन डिजाइनिंग की डिग्री ली, लेकिन मेरा मन नौकरी का नहीं था। मेरी उम्र करीब 23 साल के आसपास रही होगी। एक दिन मैने सोचा कि क्यों न गांव की महिलाओं के लिए कुछ नया किया जाए। गांव की महिलाओं के हाथों से बनी ड्रेस को ब्रांड बनाया जाए। इसके लिए मैने महिलाओं को सिलाई के साथ फैंसी परिधानों की ट्रेनिंग दी। इसकी शुरुआत उन्होंने एक साल पहले की। आज लगभग 100 महिलाएं ययाति से ट्रेनिंग लेकर ब्रांडेड ड्रेस बना रहीं हैं। अब बिजनेस को ऑनलाइन मोड पर भी चला रही हूं। मुझसे जुड़ी महिलाओं को भी धीरे-धीरे ऑनलाइन काम भी सिखाया है। अब मेरे साथ जुड़कर करीब 80 महिलाएं कार्य कर रहीं हैं। कुछ महिलाएं अलग बिजनेस कर रहीं हैं। धीरे-धीरे अब गांव की तस्वीर बदल गई है।

वर्मी कंपोस्ट बनाकर महिलाओं को दे रहीं रोजगार
मेरा नाम पायल अग्रवाल है। मेरा घर सदर में है। साल 2016 में मैने बीटेक कंप्लीट किया। इसके बाद मैं कंप्टीशन की तैयारी करने लगी। कुछ दिनों बाद सोचा क्यों न कुछ अपना ही कार्य किया जाए। इससे दूसरों को भी जॉब्स प्रोवाइट कराया जाए। मैने वर्मी कंपोस्ट के बारे में पढ़ा था। इसलिए मैंने वर्मी कंपोस्ट तैयार करने और उसकी मार्केटिंग करने का बिजनेस शुरू किया। मैने कुछ महिलाओं के साथ मिलकर दतावली गांव में फार्म हाउस पर वर्मी कंपोस्ट बनाने का प्लांट तैयार किया। अब हम लोग हर महीने 60 से 70 टन खाद तैयार कर रहे हैं। मेरे फॉर्म हाउस पर सिर्फ महिलाएं ही काम करती हैं। 15 महिलाओं को प्रॉपर ट्रेनिंग भी दी है। अब गांव की महिलाएं भी बिजनेस कर रही हैं। उनकी लाइफ स्टाइल भी बदल गई है। हमारी बनाई खाद की मांग न सिर्फ उत्तर प्रदेश में बल्कि राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और हिमाचल तक में है।