वाराणसी (ब्यूरो)लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा या फिर मेयर का, सभी में मतदान करने की प्रक्रिया बैलट पेपर से बदलकर ईवीएम मशीन में तब्दील हो गया, लेकिन नहीं बदला तो नीले कलर की स्याही का रंगआज भी मतदान करने से पूर्व हाथ की उंगली पर जो स्याही लगायी जाती है वह अमिट हैउसका न तो विकल्प मिला नहीं उसे हटाया गयादेश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने नीले रंग की स्याही को भारतीय चुनाव में जो शामिल किए वह आज तक चला आ रहा है.

1962 से चल रहा स्याही का रंग

बीएचयू सामाजिक विज्ञान संकाय में पूर्व विभागाध्यक्ष कौशल किशोर मिश्रा का कहना है कि साल 1962 के चुनाव से इस स्याही का इस्तेमाल किया जा रहा हैतब से लेकर आज तक नीले रंगी की स्याही को कोई विकल्प नहीं मिलावोट के दौरान एक सवाल जो अक्सर मतदाता के मन में उठता है वह यह कि आखिर उसका वोट कितना सुरक्षित रहेगा और कोई दूसरा उसके नाम से फज़ऱ्ी वोट तो नहीं डालेगाइस शंका की पुष्टि के लिए चुनाव अधिकारी वोटर की उंगली पर वोट देने के साथ ही नीले रंग की स्याही लगा देते हैंताकि कोई दोबारा मतदान करने आए तो पता चल सके.

फेसबुक, ट्रिवटर पर पोस्ट

केके मिश्रा का कहना है कि उंगली पर लगी यह स्याही ही इस बात का प्रतीक होती है कि किसी व्यक्ति ने अपना वोट किया है या नहींलोग स्याही लगी अपनी उंगली की तस्वीर फ़ेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर रहे हैंकई लोग नीली स्याही को मिटाने की कोशिश भी करते है लेकिन जब उसका समय आता है तभी मिटता है किसी के मिटाने से नहीं मिटता है

दूसरा विकल्प नहीं

अशोक पांडेय का कहना है कि चुनाव में हरोफेरी न हो इसके लिए बैलेट पेपर को हटाकर इवीएम मशीन ले आए लेकिन नीले स्याही का विकल्प आज तक लोगों नहीं मिलासाल 1962 के चुनाव से इस स्याही को इस्तेमाल किया जा रहा है और अभी तक चुनाव आयोग इसके दूसरे विकल्प नहीं तलाश सका हैइससे समझा जा सकता है कि यह अमिट स्याही अपना काम बीते कई दशकों से बेहतर तरीके से कर रही है.

बैलेट पेपर पर ठप्पा लगाते थे

बीएचयू के पूर्व विभागाध्यक्ष कौशल किशोर मिश्रा का कहना है कि 1952 में पहली बार बैलेट पेपर की शुरुआत हुई थीपेपर में नाम के आगे ठप्पा लगाया जाता थाइसके बाद पेपर को मोड़कर बाक्स में डाला जाता थाबैलेट पेपर से मतदान 1991 तक चलाइसके बाद ईवीएम मशीन आयाइसके बाद चुनाव में आधे जगह ईवीएम मशीन तो आधे जगह बैलेट पेपर चुनाव होता था.

बिगड़ जाती थी मशीन

कई बूथों पर ईवीएम मशीन बिगड़ जाती थी तब उस समय बैलेट पेपर से ही चुनाव कराया जाता थाउस समय लहर किसकी चलती थी वह भी पता चल जाता थाहर घर में जिस पाटी का झंडा दिखे उसकी लहर होती थी लेकिन जब से आचार संहिता लागू हुआ तब से घरों में पार्टी का झंडा रखना, बैनर-पोस्टर लगाने पर रोक लग गयाचुनाव आचार संहित के चलते किसकी लहर है यह पता कर पाना मुश्किल हो जाता है

सोशल मीडिया हावी

1998 के बाद पूरी तरह से ईवीएम मशीन आ गयाइसके बाद भी नीली स्याही का रंग बदला नहीं, ईवीएम मशीन में वोटिंग के दौरान आज भी सबसे पहले हाथ में नीली स्याही लगायी जाती हैजिस प्रकार से ईवीएम मशीन में आज के समय में गड़बड़ी नहीं हो सकती है उसी तरह से नीली स्याही में आज तक कोई गड़बड़ी नहीं नजर आयी

फैक्ट एंड फीगर

1962

से नीली स्याही की शुरुआत

1952

से शुरू हुआ बैलेट पेपर से मतदान

1991

के बाद ईवीएम मशीन से शुरू हुआ चुनाव

1998

में आधा चुनाव बैलेट पेपर तो आधा चुनाव ईवीएम मशीन से

चुनाव में नीली स्याही का आज तक कोई विकल्प नहीं मिल पायाबैलेट पेपर की जगह अब ईवीएम मशीन ने ले ली है लेकिन नीली स्याही आज भी अमिट है.

प्रोकौशल किशोर मिश्रा, पूर्व विभागाध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान बीएचयू

चुनाव के दौरान बैलेट पेपर और ईवीएम मशीन में लोग गड़बड़ी बता देते हैं लेकिन नीली स्याही लग जाने के बाद दोबारा कोई मतदान का प्रयोग नहीं कर सकता.

अशोक पांडेय, प्रदेश प्रवक्ता, बीजेपी