- गुमशुदा बच्चे बरामद करने में प्रयागराज सेक्शन पहले व वाराणसी सेक्शन दूसरे नंबर पर

- महज 20 परसेंट बच्चों के ही परिजन ढूंढ पाने में सफल होती है जीआरपी

- बाकी बचे बच्चों को चाइल्ड लाइन या संरक्षण गृह भेजने की मजबूरी

- परिजनों को तलाशने के लिये नहीं बन सका अब तक कोई मैकेनिज्म

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LUCKNOW : सूबे में बच्चों की गुमशुदगी की समस्या बेहद गंभीर रूप अख्तियार कर रही है. समय-समय पर इसे लेकर समाज के विभिन्न सेक्शंस से लेकर सिनेमा व सीरियल्स में चिंता भी जाहिर की जाती है. पर, इसे लेकर न तो शासन स्तर पर कोई स्पष्ट नीति बन पायी है और न ही यूपी पुलिस ही इसे रोकने या बरामद होने वाले बच्चों के परिजनों को तलाशने का मैकेनिज्म बना सकी है. जीआरपी द्वारा हर रोज बरामद होने वाले बच्चों के आंकड़ों पर गौर करें तो इस समस्या की गंभीरता का अंदाजा खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है. लेकिन, इसका दुखद पहलू यह है कि बरामद होने वाले बच्चों में से महज 20 प्रतिशत को ही उनके परिजन दोबारा मिल पाते हैं. जबकि, बाकी बच्चों की मंजिल चाइल्ड लाइन या संरक्षण गृहों पर जाकर खत्म हो जाती है.

बरामदगी में तीर्थ स्थल नंबर वन

प्रदेश में सबसे ज्यादा गुमशुदा बच्चे रेलवे कैंपस या फिर ट्रेन से बरामद होते हैं. अधिकांशत: इन बच्चों की उम्र एक साल से 10 साल के बीच ही होती है. इन बच्चों को बरामद करने वाली जीआरपी के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि प्रदेश में औसतन हर रोज छह बच्चे बरामद होते हैं. यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बच्चों की बरामदगी सबसे ज्यादा प्रदेश के दोनों महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों प्रयागराज या वाराणसी सेक्शंस से होती है. आंकड़ों के मुताबिक बच्चों की बरामदगी में प्रयागराज पहले नंबर पर जबकि, वाराणसी दूसरे नंबर पर है. जबकि, इस समस्या से पश्चिमी यूपी करीब-करीब अछूता ही है. यानी प्रदेश के पश्चिमी इलाके में इक्का-दुक्का या फिर न के बराबर ही गुमशुदा बच्चे बरामद होते हैं.

80 परसेंट बच्चों को नहीं मिलते परिजन

आंकड़ों के मुताबिक, बरामद होने वाले बच्चों में से 20 प्रतिशत बच्चे ही अपना नाम, परिजनों का नाम या पते का कोई सुराग दे पाते हैं. जिसके बाद संबंधित जीआरपी थाने की मदद से उनके परिजनों को तलाशा जाता है और उनके बच्चों को सुपुर्द कर दिया जाता है. पर, 80 परसेंट बच्चों के परिजनों का पता लगा पाने में जीआरपी नाकाम रहती है. नतीजतन, इन बच्चों को चाइल्ड लाइन या संरक्षण गृहों में भेज दिया जाता है. जहां से इन बच्चों को उनके घरों तक कब पहुंचाया जा सकेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं.

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नहीं बन सका कोई मेकेनिज्म

बच्चों की बरामदगी के बाद उनके परिजनों का पता लगाने के लिये जीआरपी अपने वाट्सएप ग्रुपों में इन बच्चों की फोटोग्राफ पोस्ट करती है. अगर किसी बच्चे का परिजन जीआरपी से संपर्क करता है तो उसे बरामद हुए बच्चों की फोटोग्राफ दिखाई जाती है. पहचान होने पर उस बच्चे को परिजनों के सुपुर्द कर दिया जाता है. हालांकि, यह आंकड़ा बेहद कम है. वहीं, परिजनों को तलाशने की दूसरी संभावना उस बच्चे से प्राप्त जानकारी होती है, जिसे डेवलप कर जीआरपी परिजनों तक पहुंचती है. इसके अलावा कोई अन्य मैकेनिज्म यूपी पुलिस अब तक नहीं बना सकी है.

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यूं मिल सकती है मदद

- आधार वेरीफिकेशन के जरिये

- सिविल पुलिस और जीआरपी के बीच संयुक्त नेटवर्क बनाकर

- चाइल्ड लाइन व संरक्षण गृहों में रह रहे बच्चों की पुलिस वेबसाइट में फोटो अपलोड कर

- बरामद बच्चों का डाटा बेस किसी एक सर्वसुलभ वेबसाइट पर अपलोड कर

- सोशल मीडिया माध्यमों का इस्तेमाल करके

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फैक्ट फाइल

बरामदगी 89

बालक 71

बालिका 18

परिजनों के सुपुर्द 19

चाइल्ड लाइन/संरक्षण गृह 70

आंकड़े 1 नवंबर से 15 नवंबर तक

वर्जन.................

रेल कैंपस या ट्रेन्स में बरामद बच्चों को लेकर जीआरपी बेहद संवेदनशील है. उनके परिजनों को तलाशने की हरसंभव कोशिश की जाती है. फिर भी अगर परिजन नहीं मिलते तो उन बच्चों को चाइल्ड लाइन या संरक्षण गृह भेजा जाता है.

- संजय सिंघल, एडीजी, रेलवे