रिश्तेदार ही कर रहे चाइल्ड ट्रैफिकिंग

2019-11-14T05:46:24Z

RANCHI: चाइल्ड ट्रैफिकिंग नाम सुनते ही लोगों के रोंग्टे खड़े हो जाते है। बच्चों को बाजार में काम दिलाने के नाम पर बेच दिया जाता है। वहीं कई बच्चों का तो दोबारा पता भी नहीं मिलता। अब रांची में भी चाइल्ड ट्रैफिकिंग की घटनाओं में तेजी आई है। इसमें सबसे ज्यादा ट्रैफिकर रिश्तेदार ही हैं। इसका खुलासा रेलवे चाइल्ड लाइन की दो सालों की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दूर के रिश्तेदारों ने ही बच्चों को काम दिलाने के नाम पर बेचने की तैयारी कर दी थी। हालांकि रेलवे चाइल्ड लाइन ने ऐसे ही बच्चों को रेस्क्यू कर उनका जीवन बर्बाद होने से बचा लिया।

पकड़े जाने पर बन जाते हैं रिश्तेदार

गांव-पड़ोस के लोग ही बच्चों को दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में काम दिलाने के नाम पर ले जाते हैं। वहीं ज्यादातर बच्चों को लेकर ये लोग मेट्रो सिटी तक भी पहुंच जाते हैं। इस बीच पकड़े जाने पर यही लोग खुद को बच्चों का रिश्तेदार बताने लगते हैं। इतना ही नहीं खुद को बच्चों के मां-बाप तक बता देते हैं।

एड्रेस प्रूफ मांगने पर हो जाते हैं फरार

बच्चों के साथ रेस्क्यू के दौरान पकड़े जाने पर दलाल खुद को रिश्तेदार तो बता देते हैं, लेकिन जब उनसे प्रूफ लाने को कहा जाता है तो तरह-तरह के बहाने बनाते हैं। दबाव डालने पर गायब भी हो जाते हैं। इसके बाद जब दिए गए नंबर पर कॉल किया जाता है तो फोन भी रिसीव नहीं करते। छानबीन में उनके द्वारा दिया गया एड्रेस भी गलत पाया जाता है।

1400 बच्चों को किया जा चुका है रेस्क्यू

रांची स्टेशन पर चल रहे रेलवे चाइल्डलाइन ने पिछले दो सालों में 1400 बच्चों को रेस्क्यू किया है। इन बच्चों को रेस्क्यू के बाद सीडब्ल्यूसी के सामने पेश भी कर दिया गया है। इनमें से कई ऐसे बच्चे कस्तूरबा गांधी स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं। जबकि कई बच्चों को प्रेमाश्रय-बालाश्रय में रखा गया है। इसके अलावा कई बच्चों को सीडब्ल्यूसी के सामने पेश करने के बाद जिन बच्चों को सही पाया गया उन्हें पैरेंट्स को सौंप दिया गया।

वर्जन

हमलोग रांची के अलावा अन्य स्टेशनों पर भी रेस्क्यू ऑपरेशन चलाते हैं। हर महीने लगभग 58 बच्चों को रेस्क्यू कर रहे हैं। इंक्वायरी में तो बच्चे भी यह बात एक्सेप्ट करते हैं कि उन्हें काम दिलाने के लिए ले जाया जाता है। लेकिन दलाल खुद को उनका रिश्तेदार बताने लगते है। जब पुलिस को बुलाने की बात करते हैं, तो फिर कोई नजर नहीं आता।

राजीव कुमार, को-आर्डिनेटर, रेलवे चाइल्ड लाइन

Posted By: Inextlive

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