एस्ट्रोनॉमी विभाग की असोसिएट प्रोफेसर डॉ. अलका मिश्रा ने बताया कि 1949 को प्लैनेटेरियम बनाया गया था। इसमें जो मशीन है वो 1946 से लगी है और काफी पुरानी हो चुकी है ऐसे में इसको हटाकर दूसरी अपडेटेड मशीन लगाई जाएगी।


लखनऊ (ब्यूरो)। लखनऊ यूनिवर्सिटी में खगोल विज्ञान की पढ़ाई कर रहे स्टूडेंट्स की सुविधा के लिए एलयू कैंपस में मौजूद प्लैनेटेरियम को रेनोवेट कराने की तैयारी कर रहा है। इसके जरिए स्टूडेंट्स को तारामंडल देखने, मौसमिक आकाशीय पैटर्न के बारे में सीखने और प्रोजेक्शन से आकाशीय घटनाओं की जानकारी हासिल करने का मौका मिलेगा। इसके लिए एलयू प्रशासन सरकारी एजेंसियों से अनुदान के लिए प्रस्ताव भी तैयार कर रहा है। विवि प्रशासन का मानना है कि इससे गणित और खगोलशास्त्र विभाग के पास बने प्लैनेटेरियम को नया रूप देने में मदद मिलेगी।1946 से लगी है मशीन


एस्ट्रोनॉमी विभाग की असोसिएट प्रोफेसर डॉ। अलका मिश्रा ने बताया कि 1949 को प्लैनेटेरियम बनाया गया था। इसमें जो मशीन है, वो 1946 से लगी है और काफी पुरानी हो चुकी है, ऐसे में इसको हटाकर दूसरी अपडेटेड मशीन लगाई जाएगी। इसके अलावा प्लैनेटेरियम में सिविल वर्क के साथ उसको रेनोवेट किया जाना है। इसके लिए प्रपोजल तैयार करके डीन अकेडमिक्स को भेजा गया था। इस प्रपोजल को लेकर फंडिंग एजेंसी से भी बातचीत चल रही है। जल्द ही इसको इंस्टाल किया जाएगा।बहुत पुराना है एलयू का प्लैनेटेरियम

एलयू के प्लैनेटेरियम का भारतीय खगोलशास्त्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान है। उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री डॉ। सम्पूर्णानंद के साथ मिलकर प्रो। एएन सिंह ने खगोलशास्त्र को भारत में पहली बार बीएससी डिग्री में एक पूर्ण विषय के अध्ययन के रूप में पेश किया। इसके बाद, 1949 में खगोलशास्त्र के शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए इस प्लैनेटेरियम का निर्माण पूरा कराया गया। प्लेनेटेरियम के डोम का साइज 8 मीटर है और इसमें 96 व्यक्तियों के बैठने की क्षमता है। प्लेनेटेरियम प्रोजेक्टर मशीन, स्पीट्ज-मॉडल ए1, 1946 में खरीदी गई थी। यह दुनिया भर में पहला मॉडल था जो मानक 4.3 से अधिक प्रकाशमान ताराओं का अवलोकन कराता था। स्पीट्ज के केवल 40 ऐसे मॉडलों का निर्माण हुआ था, जिनमें से एक एलयू ने खरीदा था। उस समय प्लैनेटेरियम प्रोजेक्टर मशीन की लागत $500 डॉलर थी।पूर्व छात्रों ने किया नाम रोशनएलयू के खगोलशास्त्र के छात्रों ने देश-विदेश में नाम कमाया है। डॉ। निशांत सिंह, वर्तमान में आईयूसीएए में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। वहीं, डॉ। एसपी ओझा और डॉ। मोहम्मद हसन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में वैज्ञानिक के रूप में मशहूर हुए हैं। डॉ। शशिर संख्यान एस्टोनिया के तारतू आब्जर्वेटरी में कार्यरत हैं और ये सरस्वती सुपरक्लस्टर की खोज से जुड़े हैं और डॉ। अविनाश चतुर्वेदी जर्मनी में उच्च स्तरीय अनुसंधान कर रहे हैं।

विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक प्लेनेटेरियम को पुनर्जीवित करना उसके वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा देने और भारत में अगली पीढ़ी के खगोलशास्त्रियों को प्रेरित करने के प्रति उसके समर्पण को दर्शाता है।-प्रो। आलोक कुमार राय, वीसी, एलयूइस ऐतिहासिक प्लैनेटेरियम को पुनर्जीवित करना विवि के जरिए खगोलशास्त्र शिक्षा को बढ़ावा देने का एक अद्वितीय प्रयास है।-प्रो। पूनम टंडन, डीन अकेडमिक्स

Posted By: Inextlive