सरकारी वकीलों की नियुक्ति अवैध हाई कोर्ट ने रिक्रूटमेंट के लिए दिया चार माह का मौका

2019-05-16T09:40:55Z

हाई कोर्ट ने रद की सभी सरकारी वकीलों की नियुक्तियां और नए रिक्रूटमेंट के लिए चार माह का मौका दिया

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PRAYAGRAJ: कानून मंत्री के कहने पर बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किये बलिया जिले में 14 डीजीसी, अपर डीजीसी व सहायक डीजीसी की नियुक्ति को मनमानापूर्ण एवं विधि विरुद्ध करार देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद कर दिया है. कोर्ट ने स्टेट गवर्नमेंट को जिला जज के परामर्श से डीएम द्वारा भेजे गये 51 नामों में से ही सरकारी वकीलों की नियुक्ति का आदेश दिया है. कोर्ट ने इसके लिए चार माह का समय दिया है और कहा है कि इन चार माह के दौरान काम चलाने के लिए विज्ञापन से पहले कार्यरत अधिवक्ताओं की सेवाएं ली जा सकती हैं.

कोर्ट ने सुनाया 57 पेज का फैसला
यह आदेश जस्टिस पीके एस बघेल तथा जस्टिस पंकज भाटिया की खंडपीठ ने बलिया के पूर्व सरकारी वकील संतोष कुमार पांडेय की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है. 57 पृष्ठ के अपने फैसले में कोर्ट ने राज्य सरकार के विधि मंत्रालय की कार्य प्रणाली पर तीखी टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा है कि विधि परामर्शी कार्यालय में न्यायिक अधिकारियों की तैनाती सरकार को सही कानूनी सलाह देने के लिए की गयी है. सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में कहा है कि राज्य का दायित्व है कि वह उद्देश्यपूर्ण, फेयर उचित व पक्षपातविहीन कार्यवाही करे.

80 फीसदी मुकदमे राज्य के
कोर्ट ने कहा कि 80 फीसदी मुकदमे राज्य से जुड़े होते हैं. अनुभवी व योग्य सरकारी वकीलों के सहयोग से अदालतें अच्छे निर्णय दे सकती हैं. अयोग्य लोगों की मनमानी नियुक्ति न्याय के उच्च आदशरें, मूल्यों को नुकसान पहुंचा सकती है.

डेढ़ साल पहले मांग गये आवेदन
बता दें कि 8 दिसंबर 2017 को डीजीसी, एडीजीसी व सहायक डीजीसी पैनल के लिए आवेदन मांगे गये. जिला जज के परामर्श से डीएम ने 51 नाम भेजे. इनकी अनदेखी कर 19 नाम नियुक्ति के लिए कानून मंत्रालय ने भेज दिये. सभी नये नाम थे. डीएम की आपत्ति के बावजूद मंत्री के निर्देश पर नियुक्ति की गयी. जिसे चुनौती दी गयी थी. कोर्ट ने कहा, हाई कोर्ट में एक झटके में वकीलों को हटाकर नयी नियुक्ति की गयी जो कोर्ट को उचित सहयोग देने में असमर्थ है. सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों की अनदेखी कर सरकार ने मनमानी नियुक्तियां की है.

कानून के शासन की परिकल्पना में सरकार मनमाना कार्य पद्धति की नीति नहीं अपना सकती.

-इलाहाबाद हाई कोर्ट


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