राजधानी रांची में विकास के नाम पर घनघोर अव्यवस्था का आलम है. अलग-अलग सेक्टर में करोड़ो रुपए खर्च करने के बाद भी सिटी में हर तरफ अव्यवस्था नजर आती है. डीजे आईनेक्स्ट की ओर से शुरु किए गए अभियान साहब इतनी बेकद्री क्यों सिटी के विभिन्न सेक्टर की अव्यवस्थाओं को सामने ला रहा है. इसी कड़ी में आज शामिल है ट्रैफिक सिग्नल. जी हां वहीं ट्रैफिक सिग्नल जिसे स्मार्ट करने के नाम पर करोड़ों रुपए फूंक दिए गए. लेकिन आज भी न तो ट्रैफिक सिग्नल स्मार्ट हुआ और न ही सिटी की ट्रैफिक ही कंट्रोल हो पाई.


रांची (ब्यूरो)। राजधानी के चौक-चौराहों पर लगे ट्रैफिक सिग्नल महीने में 15 दिन बंद रहते हंै। कभी टेक्निकल खराबी तो कभी बैटरी प्रॉब्लम कभी किसी और वजह से सिग्नल बंद रहता है। रांची में 17 चौक-चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल लगाया गया है। राजधानी रांची की ट्रैफिक व्यवस्था को हाईटेक करने के कई दावे किए गए। इस दावा के तहत सिटी में ट्रैफिक सिग्नल में सुधार और ट्रैफिक के अन्य साधनों पर खर्च करने के लिए 164 करोड रुपए की योजना बनी, जिसमें रांची में 60 चौराहों को स्मार्ट जंक्शन बनाने और 81 स्थानों पर स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल लगाने, कैमरा समेत दूसरे उपकरण पर खर्च होने थे। लेकिन अब तक ऐसा कुछ हुआ नहीं। इन तीन सालों में सिर्फ &0 स्थानों पर ही ट्रैफिक सिग्नल लगाया गया। वह भी नियमित जलता नहीं है। स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल लगाने में करीब 86 लाख रुपए खर्च हुए हैं। सिग्नल लगाने से पहले जो दावे किए गए उसके अनुसार सिग्नल काम भी नहीं करता है। स्मार्ट सिग्नल के तहत सड़क की भीड़ और दबाव के अनुसार सिग्नल ऑटोमेटिक चेंज होना था, लेकिन वास्तविकता तो यह है कि स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल होते हुए भी ट्रैफिक पुलिस मैन्युअली ही ट्रैफिक कंट्रोल कर रही है वहीं स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल के अंतर्गत अगले चौराहे पर हादसा या दूसरी किसी बाधा होने की स्थिति में भी सिग्नल द्वारा ही रूट डायवर्ट करने का विकल्प था। लेकिन हकीकत इसकी भी कुछ और ही है। स्मार्ट ट्रैफिक को कंट्रोल करने के लिए स्मार्ट जंक्शन पर एडेप्टिव ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम लगाने की योजना थी, जो सिर्फ हवा हवाई ही साबित हुई। मेनटेनेंस के अभाव में बर्बादी
नए ट्रैफिक सिग्नल को लगे अभी एक साल भी पूरी नहीं हुआ, लेकिन यह बर्बाद होना शुरू हो चुका है। कहीं सिग्नल की लाइट टूट कर गिर गई है, तो कहीं रस्सी से बांध कर काम चलाया जा रहा है। मेन रोड सुजाता चौक के समीप बीते एक महीने से अधिक समय से ट्रैफिक सिग्नल टूट कर गिरा हुआ है। मेन रोड सर्जना चौक के समीप लगे ट्रैफिक सिग्नल भी टूट कर गिरे पड़े हैं। लेकिन इसकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं। ट्रैफिक सिग्नल लगने के बाद भी छह महीने तक इसके जलने का इंतजार होता रहा। इससे पहले पुराने सिग्नल से ही काम चल रहा था। जब बार-बार सवाल उठने लगे तो नए सिग्नल को शुरू किया गया। लेकिन कुछ ही दिनों में बैटरी डाउन होने की शिकायत आने लगी। कांटाटोली चौक पर लगे सिग्नल अक्सर बैटरी डाउन होने कारण बंद रहते हैं। जबतक बिजली रहती है सिग्नल काम करता है, लाइट कटते ही पांच मिनट का भी बैकअप नहीं मिलता और सिग्नल बंद हो जाते है। मैन्युअली ट्रैफिक कंट्रोल


ट्रैफिक सिग्नल के नहीं जलने या इसके खराब पड़े होने के कारण ट्रैफिक पुलिस मैन्युअली ही ट्रैफिक कंट्रोल कर रही है। सिटी का सबसे वीआईपी रोड जिस रास्ते से होकर मुख्यमंत्री, राज्यपाल और सभी मंत्री, विधायक व अधिकारी गुजरते हैं। वहां बीते दो महीने से ट्रैफिक लाइट खराब है। सहजानंद चौक के समीप लगा ट्रैफिक सिग्नल दो महीने से नहीं जल रहा। यहां ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों ने बताया कि दो महीने पहले रोड मरम्मती के लिए गड््ढा किया गया था, जिसमे तार कट गया। न तो रोड बना और न ही ट्रैफिक सिग्नल ठीक किया गया। इसी तरह मेन रोड और कांटाटोली की भी ट्रैफिक लाइट नहीं जल रही है। विभाग आम नागरिकों को भले सुविधा नहीं दे रहा है, लेकिन नए मोटर व्हीकल एक्ट लागू होने के बाद लोगो से ट्रैफिक रूल ब्रेक करने के नाम पर लगातार वसूली की जा रही है। 10 से अधिक चौराहे ऐसे हैं, जहां दिन भर येलो लाइट ही जलती रहती है, उसे ट्रैफिक कर्मी नियंत्रित करते हैं। सुजाता चौक के पास कभी पीला, तो कभी लाइट गिनती करते-करते शून्य पर आ जाता है। इससे सभी तरफ के वाहन चालक दुविधा में फंस जाते हैं।

Posted By: Inextlive