झारखंड के ‘वीरप्पन’ कुंदन पाहन के गांव से लाइव

2017-05-12T22:33:07Z

झारखंड के 'वीरप्पनन' के गांव पहुंची जब दैनिक जागरण आई नेक्ट्रें की टीम। लोग कहते हैं कि कुंदन ने हथियार डाला अब तो गांव का विकास कीजिए हुजूर! सबसे बड़े नक्सली के सरेंडर से खुश हैं उसके गांव के लोग।

गांव के किसी व्यक्ति को सबसे खूंखार नक्सली से शिकायत नहीं
चार-पांच कमरों वाला मिट्टी का छोटा-सा घर और खपरैल की छत। हम इस घर के आंगन में खड़े हैं और यकीन कर पाना मुश्किल है कि यह उस नक्सल कमांडर कुंदन पाहन का घर है, जो पिछले दो दशकों से झारखंड-उड़ीसा-छत्तीसगढ़ की पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ था। करीब आठ-दस पुरानी उसकी एक धुंधली-सी तस्वीर के सिवा पुलिस के पास ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे यह पता चल सके कि राज्य के सबसे खूंखार और एक हद तक वीरप्पन जैसी इमेज वाला 38 वर्षीय कुंदन का हुलिया कैसा है। उसके घर-परिवार, गांव वालों और बचपन में साथ पढ़े दोस्तों में से किसी के भी पास उसकी एक अदद फोटो तक नहीं। 100 से भी अधिक हत्याओं का आरोपी यह मोस्ट वांटेड नक्सली कुंदन अब रांची पुलिस के पास है। उसने अपनी शर्तों पर हथियार डाल दिया है। हालांकि पुलिस ने अब तक ऑफिशियली उसका सरेंडर डिक्लेयर नहीं किया है, लेकिन उसके पिता नारायण पाहन, भाई जंगल पाहन, भतीजे चटकन से लेकर गांव के एक-एक बच्चे को पता है कि कुंदन ने अपनी मर्जी से खुद को पुलिस के हवाले कर दिया है।

 

कौन है कुंदन पाहन
40 वर्षीय कुंदन पाहन को झारखंड का सबसे खूंखार और शातिर नक्सली माना जाता है। उसने वर्ष 2009 में रांची-टाटा हाईवे पर स्पेशल ब्रांच के इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदवार का तालिबानी अंदाज में सिर कलम कर दिया था। इसके पहले 2008 में इसी हाईवे पर उसके दस्ते ने साढ़े पांच करोड़ की रकम लेकर जा रही आईसीआईसीआई बैंक की कैश वैन को लूट लिया था। झारखंड के पूर्व मंत्री और तमाड़ के एमएलए रमेश सिंह मुंडा और डीएसपी प्रमोद कुमार की हत्या के पीछे भी कुंदन ही था। रांची, खूंटी, सरायकेला, चाईबासा और कई अन्य जिलों में 100 से भी ज्यादा हत्याओं में उसका हाथ बताया जाता है। झारखंड पुलिस ने उसपर 15 लाख का इनाम रखा था।


राजधानी रांची से कोई 80 किलोमीटर दूर अड़की ब्लॉक अंतर्गत पहाडि़यों की तलहटी में जंगल-झाड़ से घिरे कुंदन के गांव बारीगढ़ा पहुंचने के लिए हमें करीब 20 किलोमीटर पथरीले रास्ते का सफर तय करना पड़ा। गांव घुसते ही हमारी मुलाकात सबसे पहले चापानल पर पानी भरती बुजुर्ग महिला से होती है। हम उन्हें जोहार (प्रणाम) करते हैं और पूछते हैं कि कुंदन पाहन का घर कौन-सा है? वह सामने के खपरैल घर की ओर इशारा करती हैं। हम आगे कुछ पूछें कि तीन-चार लोग अपने घरों से बाहर निकल आते हैं। हम उन्हें बताते हैं कि हमलोग दैनिक जागरण-आई नेक्स्ट की ओर से आए हैं। उनमें से एक युवक कहता है- अच्छा, आपही ने सबसे पहले कुंदन के सरेंडर की खबर छापी है। वह दोनों हाथ जोड़कर जोहार कहते हुए अपना नाम बताता है-बुधन सिंह मुंडा। हम आगे कुछ पूछें,  इसके पहले वह खुद बताता है- कुंदन और हमने बचपन में स्कूल में एक साथ पढ़ाई की है। यह बहुत अच्छी बात है कि उसने सरेंडर कर दिया है। हमें उम्मीद है कि अब हमारे गांव का विकास होगा। नेता, पुलिस-प्रशासन किसी का हमारे गांव की ओर ध्यान नहीं था। सोमवार को पुलिस के कुछ लोग कुंदन को लेकर गांव आए थे। उसने बताया कि वह खुद अपनी मर्जी से सरेंडर कर रहा है। डेढ़-दो घंटे तक वह घरवालों के साथ रहा। हमलोगों से भी बात हुई। उसने कहा कि अब गांव की हालत बदलेगी। फिर पुलिस वाले उसे साथ लेकर चले गए। वह खुश दिख रहा था।

 

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क्या गांव के लोग चाहते थे कि कुंदन को सरेंडर कर देना चाहिए? हमारे इस सवाल पर बुधन सिंह मुंडा कहता है, बिल्कुल सर! कुंदन तो मजबूरी में पार्टी (यानी नक्सली संगठन) में शामिल हुआ था। कुछ लोगों ने उसके पिता  की जमीन पर जबरन कब्जा कर लिया था। ऐसे में वह क्या करता? जंगल जाकर पार्टी में शामिल हो गया। बचपन में वह बिल्कुल शांत लड़का था। कुंदन के घर के सामने स्थित एक पेड़ की ओर इशारा करते हुए वह बताता है-हमलोग यहीं घंटों बैठकर बतियाया करते थे। वह गांव में सभी बड़ों का आदर करता था। उसने मजबूरी में बंदूक पकड़ी तो फिर जंगल का होकर रह गया।

 

बुधन सिंह मुंडा के साथ बात करते हुए हम कुंदन पाहन के आंगन में पहुंचे। पता चला कि उसके पिता नारायण पाहन बुंडू बाजार (गांव से करीब 40 किलोमीटर एक कस्बा) गए हैं। गांव में दो दिन के बाद मंडा पूजा है, जिसके लिए कुछ सामान खरीदना था। नारायण पाहन गांव के मुख्य पाहन (पुजारी) हैं और गांव में होनेवाला हर धार्मिक आयोजन उन्हीं की अगुवाई में होता है। इसी बीच कुंदन की भाभी (भाई जंगल पाहन की पत्नी) कमरे से निकलकर आंगन में आती हैं। वह बताती हैं- सोमवार को कुंदन आए थे।।।पुलिस वाले भी उनके साथ थे। थोड़ी देर में चले गए। सोमवार से पहले कुंदन आखिरी बार कब घर आए थे? वह बोलती हैं- दू-चार महीना में एकाध बार आ जाते हैं। भतीजा चटकन की शादी में कुछ महीना पहले आए थे। वह हमें खाने के लिए केंद (जंगली फल) देती हैं।

 

फिर हम हम गांव की गलियों में घूमने निकलते हैं। कुंदन के घर के सामने ही एक सरकारी मिडिल स्कूल है। पूछने पर गांव के बानु मुंडा बताते हैं कि यहां चार मास्टर हैं। क्लास आठ तक की पढ़ाई होती है। गांव में दो साल पहले ही बिजली आई है। लुहार का काम करनेवाले जंगल लोहरा कहते हैं कि सरकार का गांव पर कोई ध्यान नहीं है। नेता भी खाली भोट (वोट) मांगने आते हैं। एक भी इंदिरा आवास नहीं है। खूंटी जाकर डीसी के पास आवेदन भी दिए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। 70-80 घरों के गांव में चार चापाकल हैं, जिसमें एक खराब पड़ा है। एतवरिया, बुधनी, चटन सहित कई लोगों से बात होती है। सबकी एक ही चिंता है- अब गांव का विकास होना चाहिए। कुंदन के बचपन के दोस्त बुधन सिंह मुंडा कहते हैं कि अत्याचार नहीं हो, गांव में सड़क-रोजगार का साधन हो तो कोई काहे जंगल (यानी नक्सली संगठन में) जाएगा। हम गांव से वापस निकलने को हैं। बुधन हमसे अनुरोध करते हैं- गांव की एक-एक समस्या के बारे में छापिएगा। शायद अब अफसरों-नेताओं की नींद खुले।

 

Story By: Shambhunath.choudhary@inext.co.in, Kuber.singh@inext.co.in

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Posted By: Chandramohan Mishra

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