भारत की युवा एथलीट दुती चाँद का शारीरिक बदलाव के कारण अंतरराष्ट्रीय खेलों से बाहर किया जाना इस प्रकार का पहला मामला नहीं है.


1978 के बैंकॉक एशियन गेम्स में भारत की एक स्प्रिंटर को जेंडर टेस्ट में फेल हो जाने के कारण खेलों से बाहर किया गया था.नौबत यहाँ तक आ गई थी की वो खिलाड़ी होटल की खिड़की से कूदकर आत्महत्या करना चाहती थीं.लेकिन वहाँ मौजूद कोच की सूझबूझ और कुछ अन्य खिलाड़ियों की मदद से उस एथलीट को बीमारी के बहाने वापस भारत भेज दिया गया और किसी की भनक तक नहीं लगी.नॉरिस प्रीतम का विश्लेषणकास्टर सेमेन्या के मामले में भी जेंडर टेस्ट की बात उठी थी. 1973 के मॉन्ट्रियल ओलम्पिक खेलों में ब्रिटेन की राजकमारी ऍन ने घुड़सवारी में हिस्सा लिया था लेकिन सिर्फ उन्हें इस टेस्ट से माफ़ किया गया था जबकि बाक़ी सभी महिला खिलाडियों को टेस्ट देना पड़ा था.
लेकिन यह टेस्ट महिलाओं को बड़ा क्रूर लगता था और लगातार इसका विरोध होता रहा. पर यह तय करना भी ज़रूरी था कि महिला वर्ग में सिर्फ पूर्ण रूप से महिला ही भाग लें.फिर भी विरोध के कारण अटलांटा ओलम्पिक के बाद इस टेस्ट को बंद कर दिया गया. लेकिन जब दक्षिण अफ़्रीकी एथलीट कास्टर सेमेन्या का मामला सामने आया तो एक बार फिर लिंग टेस्ट की बात उठी.


लेकिन शारीरिक परीक्षण के बदले महिलाओं के हायराइन्द्रोजैनिस्म को जांचा गया जिससे महिलाओं के शरीर में टेस्टोस्टेरॉन स्तर को मापा जा सके.समानता को तरजीहयह उन्हें प्रकृति की देन है, ठीक उसी तरह जैसे किसी का रंग गोरा है तो किसी का काला. या कोई लम्बा है या फिर कोई छोटा. तो अगर रंग या लंबाई के आधार पर कोई भेद नहीं है तो फिर हार्मोंस पर ही क्यों रोक है?दुती चाँद के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका हक़ दिलाने वालों में कनाडा के पूर्व ओलम्पिक एथलीट ब्रूस किड भी हैं.किड ने अपने एथलेटिक करियर के दिनों में काफी समय जयपुर में सोशल वर्क में बिताया है और अब वो टोरंटो यूनिवर्सिटी में डीन के पद पर हैं.किड ने बीबीसी को बताया कि इस टेस्ट का मतलब किसी महिला को पुरुष क़रार देना नहीं है.डोपिंगखेल की दुनिया में डोपिंग को एक चुनौती के तौर पर देखा जाता है. उनका कहना था कि यह तय करना ज़्यादा ज़रूरी है कि किन हालत में किसी महिला में टेस्टोस्टेरॉन का स्तर बढ़ा है.

उनका इशारा उन महिलाओं की ओर था जो जानबूझ कर दवा के जरिए अपना टेस्टोस्टीरॉन स्तर ज़्यादा कर लेती हैं जिससे उन्हें बाक़ी महिलाओं के मुकाबले ज़्यादा शक्ति मिलती है. यह बेईमानी है और इसी को डोपिंग करार दिया जाता है. और इसी लिए इस नियम की ज़रूरत भी पड़ी.किड को भरोसा है कि वो दुती चाँद का केस जीतेंगे. भले ही उसमें लंबा समय लग जाए.

Posted By: Satyendra Kumar Singh