मेरठ (ब्यूरो)। हर साल की तरह इस साल भी वायु में प्रदूषण के इजाफे के साथ शहर में दमे और एलर्जी के मरीजों की संख्या में इजाफा होना शुरु हो गया है। भले ही यह बढ़ता हुआ प्रदूषण दमे और एलर्जी के मरीजों को अधिक परेशान करता हो लेकिन अब इस प्रदूषण का असर डायबटीज, मनोरोग, नेत्र रोगियों पर भी पडऩे लगा है। ऐसे में प्रदूषण के कारण कई नए प्रकार के केस सरकारी अस्पतालों में आने शुरु हो गए हैं। इसके चलते सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में मरीजों की भरपूर भीड़ दिखाई दे रही हैं। इसमें वायरल फीवर के बाद दूसरी संख्या सांस के मरीजों और एलर्जी के मरीजों की संख्या बनी हुई है।

बुखार के साथ एलर्जी
बदलते मौसम में हर साल वायरल निमोनिया, अस्थमा और छाती में संक्रमण जैसे मरीजों की संख्या बढऩे लगती हैं। इन मरीजों को सांस लेने में कठिनाई, खांसी, बुखार, कफ और नींद न आने जैसी परेशानियां आना शुरु हो जाती हैं। वहीं प्रदूषण के कारण दमे के मरीजों के साथ साथ आंखों में जलन के मरीजों की संख्या में भी इजाफा होना शुरू हो गया है।

बढ़ा अस्थमा का दायरा
इतना ही नहीं, प्रदूषण के कारण एलर्जी से खांसी, सांस फूलने आदि की परेशानी मरीजों में बढऩे लगी है। वायु प्रदूषण बढऩे के कारण अधिकतर मरीजों को छाती में घरघराहट, सांस फूलने और अस्थमा की समस्या होने लगी है। वहीं अस्पतालों में आने वाले इन मरीजों में से ऐसे मरीज भी हैं जिन्हें पहले से अस्थमा की बीमारी नहीं थी। इन मरीजों को भर्ती कर उपचार में स्टेरायड और ऑक्सीजन सप्लीमेंट दिए जा रहे हैं।

मेडिकल कालेज में मरीजों की संख्या
गत दो दिनों से रोजाना 1100 मरीजों से अधिक मरीज ओपीडी में पहुंचे
सोमवार को 327 और मंगलवार को 208 के करीब वायरल फीवर के रहे मरीज
इन दो दिन में करीब 182 रहे एलर्जी के मरीज
आंख व स्कीन की एलर्जी के मरीजों की संख्या रही 221 के पार
दो दिन में 163 के करीब रही सांस व दमे के मरीजों की रही संख्या
वहीं मनोचिकित्सक विभाग में रोजाना बढ़ रहे 25 से 30 मरीज

फेफडों के साथ बिगाड़ रहा दिमाग का गणित
वहीं वायु प्रदूषण का बढ़ता स्तर ना सिर्फ हमारे शारीरिक बल्कि मानसिक सेहत का भी गणित बिगाड़ रहा है। प्रदूषण से मानसिक रूप से नकारात्मक में इजाफा होता है। इसके अलावा डायबटीज और फेफड़ों के मरीजों के लिए भी प्रदूषण नुकसान दायक साबित हो रहा है।

फेफड़ों में फंस रहे प्रदूषण के कण
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो प्रदूषित हवा का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव आपको फेफड़ों पर देखा जाता रहा है। जब हम प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं, तो कण और हवा में मौजूद रसायन श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। सूक्ष्म कण, ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसे वायु प्रदूषक फेफड़ों के लिए बहुत हानिकारक माने जाते हैं। ये सूक्ष्म कण श्वसन मार्ग में प्रवेश कर अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और क्रोनिक श्वसन समस्याओं को ट्रिगर कर सकते है, इससे फेफड़ों को क्षति पहुंचने का भी खतरा रहता है।

मूड स्विंग से लेकर नींद हो रही गुम
वहीं वायु प्रदूषण के एक अंजाने असर से मानसिक रोगी या कहें सामान्य लोग भी प्रभावित हो रहे हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार बढ़ते प्रदूषण के कारण लोगों को मूड स्विंग, स्ट्रेस, अत्याधिक गुस्सा, चिड़चिड़ापन से लेकर अत्याधिक नींद ना आने तक की समस्या से जूझ रहे हैं। प्रदूषित हवा से स्ट्रेस-एंग्जाइटी के साथ डिमेंशिया-अल्जाइमर रोग और अवसाद के बढऩे की संभावना बन जाती है।

इस तरह करें बचाव
सुबह शाम की वॉक पर जाने से बचें
सांस के मरीज हैं और इन्हेलर ले रहे हैं तो उसे नियमित लेते रहें।
डॉक्टर से परामर्श करने के बाद ही फ्लू और निमोनिया का टीका लगवाएं।
घर वापस आने के बाद गुनगुने पानी से गरारे करें ताकि प्रदूषित कणों के शरीर के अंदर जाने की संभावना को कम किया जा सके।
पानी ज्यादा से ज्यादा पिएं। गुनगुना पानी पीने की आदत डालें।
बाहर से आने पर मुंह जरूर धोएं।

हरी पत्तेदार सब्जियों का करें सेवन
प्रदूषण से बचाव के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां बहुत उपयोग हैं। ये फेफड़ों को स्वस्थ रखने और इसकी कार्यक्षमता को बढ़ाने का काम करती हैं। इसके अलावा प्रदूषण से बचाव के लिए आंवला, अजवाइन का पानी, गुड, हल्दी वाला दूध का प्रयोग कर सकते हैं।

पालक
पालक में बीटा कैरोटीन, जैक्सैन्थिन, ल्यूटिन और क्लोरोफिल होता है - ये सभी आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार हैं। इसमें विशेष रूप से फेफड़ों के लिए मजबूत कैंसर विरोधी गुण पाए गए हैं।

ब्रोकली
ब्रोकली में सल्फोराफेन होता है, जो हमारी आंत के माध्यम से बेंजीन नामक एक कार्सिनोजेन के उच्च स्तर को बाहर निकालने में मदद करता है। इसके अलावा ब्रोकली में भरपूर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है जो हमारे इम्युनिटी लेवल को भी बढ़ाने में मदद करता है।

मौसमी फल
इन दिनों मौसमी फलों का सेवन करना लाभकारी माना जाता है। मौसमी फल विटामिन-सी और ई जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होते हैं, जो प्रदूषण से होने वाले ऑक्सीडेटिव क्षति से बचाने में मदद कर सकती है। मौसमी फल जैसे सेब, संतरे के सेवन को भी फेफड़ों के लिए लाभकारी प्रभावों वाला माना जाता है।

लहसुन, हल्दी
लहसुन और हल्दी प्रदूषण से होने वाले संक्रमण और सूजन के जोखिम को कम करके फेफड़ों के स्वास्थ्य में सहायक है। हल्दी में एक्टिव कंपाउंड करक्यूमिन होता है जो सूजन-रोधी गुणों के लिए जाना जाता है। फेफड़ों में जलन और खांसी से राहत पाने के लिए हल्दी और घी के मिश्रण का सेवन कर सकते हैं।

टमाटर
टमाटर बीटा-कैरोटीन, विटामिन-सी और लाइकोपीन से भरपूर होते हैं, ऐसे एंटीऑक्सिडेंट्स जो सांस की नली की सूजन को कम करने में मदद करते हैं, जिससे अस्थमा और अन्य श्वसन समस्याओं के होने की संभावना कम हो जाती है। साथ ही टमाटर में मौजूद बीटा-कैरोटीन फेफड़ों को जवान रखता है।

प्रदूषण के कारक बहुत सारे हैं जिन पर रोक का प्रयास ग्रेप के माध्यम से किया जा रहा है लेकिन इससे बचाव के लिए बेसिक सावधानियां बहुत जरुरी हैं कि मास्क पहनें, अनावश्यक रुप से प्रदूषित जगहों पर ना जाएं, सुबह शाम वॉक कम कर दें। इस दौरान सांस, अस्थमा, दमा, एलर्जी के मरीजों को बहुत ध्यान रखना चाहिए।
डॉ। विश्वजीत बैंबी, सीनियर फिजीशियन

प्रदूषण मानसिक स्तर पर मूड स्विंग, डिप्रेशन, एन्जाइटी के साथ साथ अत्याधिक गुस्सा, नींद में कमी में इजाफा कर सकता है। अधिकतर मरीजों में इस मौसम में यह लक्षण देखे जा रहे हैं लेकिन अधिकतर मरीजों को यह समझ ही नही आता कि यह प्रदूषण के कारण भी हो सकते हैं।
डॉ। तरुण पाल, एचओडी, मनोरोग विभाग मेडिकल कालेज

प्रदूषण के कारण सांस के मरीजों की संख्या में अधिक इजाफा हुआ है। मरीजों को घुटना, सांस लेने में परेशानी जुकाम आदि की समस्या हो रही है। बचाव के लिए दवाओं के साथ साथ नेचुरली खानापान में बदलाव और मॉस्क का प्रयोग करना जरुरी है।
डॉ। विनोद द्विवेदी, होम्योपैथिक मेडिकल ऑफिसर, पीएल शर्मा आयुष विंग